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जानियें हिंदू धर्म के 16 संस्कारों के बारे में और जाने इन प्रत्येक संस्कार को कैसे किया जाता है

हिंदू धर्म के 16 संस्कार - Astroupdate.com
June 23, 2021

जाने हिंदू धर्म के 16 संस्कारों के बारे में, इनके नाम और जीवनकाल के किस समय प्रत्येक संस्कार को कैसे किया जाता है।

हिंदू धर्म के 16 संस्कार – सनातन धर्म को विश्व में प्राचीन धर्म की मान्यता प्राप्त है। इस धर्म में माता के गर्भ से लेकर, मृत्यु हो जाने के बाद तक व्यक्ति के संस्कार किए जाते है। हिंदू धर्म में कुल सोलह प्रकार के संस्कार होते हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनियों द्वारा कई वर्षों की तपस्या और शोध किए जाने के बाद इन सोलह संस्कारों की स्थापना की गई थी। जीवन में आने वाली कठिनाइयों से मुक्ति पाने और आत्मा की शांति के लिए इन संस्कारों को संपन्न किया जाता है। युगों से इन संस्कारों का पालन हिंदू धर्म के अनुयायियों द्वारा किया जाता आ रहा है। तो आज जाने इस सोलह संस्कारों के नाम और इनके बारे में। आइए जानते हैं हिंदू धर्म के 16 संस्कार :-

सनातन धर्म में संपन्न किए जाने वाले 16 संस्कार के नाम (Sixteen Sacred Rites Of Hinduism)

  • गर्भाधान संस्कार
  • पुंसवन संस्कार
  • सीमन्तोन्नयन संस्कार
  • जातकर्म संस्कार
  • नामकरण संस्कार
  • निष्क्रमण संस्कार
  • अन्नप्राशन संस्कार
  • चूड़ाकर्म संस्कार 
  • कर्णवेध संस्कार
  • विद्यारंभ संस्कार
  • उपनयन संस्कार
  • वेदारंभ संस्कार
  • केशांत संस्कार
  • समावर्तन संस्कार
  • विवाह संस्कार
  • अंत्येष्टि संस्कार


गर्भाधान संस्कार 

हिंदू धर्म के अनुयायी उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए इस संस्कार को करते हैं। यह प्रथम संस्कार जन्म से पहले किए जाने वाला संस्कार है। पुरुष और स्त्री के शारीरिक मिलन को गर्भाधान संस्कार का नाम दिया गया है। गर्भ स्थापना के बाद होने वाले प्राकृतिक दोषों के समाधान हेतु इस संस्कार को करना आवश्यक माना गया है।

 

पुंसवन संस्कार

गर्भाधान के तीन महीने बाद शिशु का मस्तिष्क विकसित होने लगता है, उस समय पुंसवन संस्कार को किया जाता है। इस संस्कार के बाद महिला अपने खानपान और व्यवहार में परिवर्तन लाती है। शिशु की रक्षा के लिए महिला को कई वस्तुओं को त्यागना पड़ता है। अभिमन्यु ने इस संस्कार के बाद चक्रव्यूह भेदने की शिक्षा ग्रहण कर ली थी। 

 

सीमंतोन्नयन संस्कार

गर्भ में सातवें महीने के पश्चात शिशु को दुख और सुख का ज्ञान होने लगता है और वह बाहर की आवाजों को अनुभव करने लगता है। गर्भाधान के सातवें से नौवें महीने के समय काल में इस संस्कार को किया जाता है। इस संस्कार के बाद से महिला गर्भ में पल रहे शिशु को संस्कार देने में सक्षम होती है।

 

जातकर्म संस्कार

शिशु को नौ महीने गर्भ में रहने के बाद जन्म के पश्चात, गर्भ नलिका काटकर मां से अलग कर देते हैं। इस समय जन्म के तुरंत बाद जातकर्म संस्कार किया जाता है। इस संस्कार के समय शिशु को पित्त दोष से मुक्त करने के लिए सोने के चम्मच या तीसरी उंगली का प्रयोग करके शहद और घी दिया जाता है।

 

नामकरण संस्कार

जन्म के पश्चात हवन यज्ञ करके जन्म तिथि, स्थान, नक्षत्र और समय को ध्यान में रखकर उसकी जन्म कुंडली बनाई जाती है। इसी के आधार पर गणना करके बच्चे का नामकरण करके इस संस्कार को संपन्न किया जाता है। जीवन भर बच्चे की पहचान के रूप में उसका नाम रखा जाता है।

 

निष्क्रमण संस्कार

जातकर्म संस्कार के चार माह तक बच्चे को घर से बाहर नहीं ले जाया जाता है। बच्चे की नाजुक हालत में उसे वातावरण के संपर्क में लाने से बचाया जाता है। ताकि उसे संक्रमण न हो पाए। इस संस्कार में बच्चे के कल्याण की प्रार्थना कर उसकी दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

 

अन्नप्राशन संस्कार 

जन्म के छह माह बाद इस संस्कार को करके बच्चे को भोजन के रूप में तरल या अर्धठोस अन्न आदि ग्रहण करवाया जाता है। इस संस्कार से पहले बच्चा पूरी तरह मां के दूध पर निर्भर होता है। सनातन धर्म में पहली बार भोजन खिलाना ही अन्नप्राशन संस्कार माना गया है।

 

मुंडन संस्कार

जन्म के पश्चात एक या तीन वर्ष पूर्ण होने पर यह संस्कार किया जाता है, जिसे चूड़ाकर्म संस्कार भी कहा जाता है। इस समय मां के गर्भ से प्राप्त बालों को सिर से हटा दिया जाता है। एक साल की आयु से पहले बच्चे का सिर बहुत नाजुक अवस्था में होता है, इसलिए इस संस्कार को एक वर्ष का हो जाने के उपरांत उचित और उत्तम माना जाता है।

 

कर्णवेध संस्कार 

प्राचीन काल में यह संस्कार बालक के साथ भी किया जाता था। लेकिन आज के समय में यह संस्कार ज्यादातर बालिकाओं के साथ किया जाता है। इस संस्कार में एक कान में आभूषण और दूसरे कान में छेद करने से राहु और केतु के बुरे प्रभाव समाप्त किया जाता है।

 

विद्यारंभ संस्कार

यह संस्कार तब किया जाता है जब बच्चे की आयु 5 या 8 वर्ष हो जाती है। इस संस्कार के बाद बच्चा शिक्षा ग्रहण करना आरंभ कर देता है। शिक्षा ग्रहण के पहले चरण में बच्चे को वर्णमाला के अक्षरों के बारे में सिखाया जाता है, जिससे उसे भाषा का ज्ञान हो सके।

 

उपनयन संस्कार

यज्ञोपवीत के नाम से प्रसिद्ध इस संस्कार में बालक को 8 से 12 बारह वर्ष की आयु में जनेऊ धारण करवाया जाता है। जिसके लिए उसे कठिन प्रतिज्ञा लेकर जीवन भर इन नियमों का पालन करना होता है। 

 

वेदारंभ संस्कार

यज्ञोपवीत संस्कार के बाद वेदों का ज्ञान लेने की प्रक्रिया को शुरू करने से पहले किए जाने वाले संस्कार को वेदारंभ संस्कार कहा जाता है। 

 

केशांत संस्कार 

इस संस्कार के बाद शिष्य को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करनी होती है। इस समयकाल में शिष्य को दाढ़ी और मुंडन करवाना वर्जित माना जाता हैं। शिक्षा पूरी हो जाने पर ही शिष्य का मुंडन किया जाता है। इस संस्कार के बाद पहली बार दाढ़ी बनाना शिक्षा का पूर्ण होना माना जाता है। 

 

समावर्तन संस्कार

ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिष्य को 25 साल की आयु तक गुरुकुल में रहना होता है। इस संस्कार के बाद शिष्य, गुरुजनों का आर्शीवाद प्राप्त कर वापस घर की ओर प्रस्थान करता है। 

 

विवाह संस्कार

गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए विवाह संस्कार करना अति आवश्यक है। सात प्रकार के विवाह के अलावा ब्रह्म विवाह को सभी में उत्तम माना गया है। विवाह संस्कार के पश्चात ही मनुष्य पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है।

 

अंत्येष्टि संस्कार

मानव जीवन का सबसे अंतिम संस्कार अंत्येष्टि नाम से जाना जाता है। मानव शरीर का निर्माण पंचभूतों से होता है, इसलिए मृत्यु के पश्चात इसे आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि और जल में मिलाना जरूरी होता है। अंत्येष्टि संस्कार करके मनुष्य शरीर को पंचभूतों में मिला दिया जाता है और इसी संस्कार के बाद आत्मा को शांति मिलती है।

 

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