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ब्रह्मा जी का मंदिर पुष्कर, वंशावली, पत्नियां, बेटी, आरती और कहानी | Brahma Ji Ka Mandir

ब्रह्मा जी का मंदिर
January 24, 2022

जानिए ब्रह्मा जी का मंदिर क्यों नहीं है ? | सम्पूर्ण जानकारी |Brahma Ji Ka Mandir

ब्रह्मा जी जो की इस संसार की परब्रह्म शक्ति है. तीनों देवत्व शक्ति में सर्वप्रथम और मुख्य स्थान ब्रह्मा जी का ही होता है. ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों अद्वितीय शक्तियों में ब्रह्मा जी का स्थान मुख्य है। परन्तु ब्रह्मा जी का मंदिर आपको कंही भी नहीं दिखाई देगा।  हिंदू धर्म ग्रंथों में ब्रह्मा जी के द्वारा ही सभी देवताओं की उत्पत्ति होने का उल्लेख मिलता है। ब्रह्मा जी इस संसार के रचयिता हैं।  और विष्णु जी इस संसार के पालनहार है और भगवान शंकर संसार की विनाशक शक्तियों के हरणकर्ता है.

हिंदू शास्त्रों में सभी देवताओं का उल्लेख विस्तार पूर्वक पढ़ने को मिलता है, परंतु ब्रह्मा जी के जीवन परिचय पर बहुत कम ग्रंथों में उल्लेख पढ़ने को मिलता है, ब्रह्मा जी के जीवन परिचय को पदम पुराण में उल्लेखित किया गया है।  ब्रह्मा जी सभी देवताओं में वशिष्ठ देवत्व का पदभार संभाले हुए हैं और सृष्टि के रचयिता होते हुए भी उनकी पूजा बहुत कम और चयनित स्थान पर ही होती है।  हालाँकि ब्रह्मा जी सभी त्रिदेव शक्ति में श्रेष्ठ शक्ति हैं, परंतु ब्रह्मा जी का कोई मंदिर क्यों नहीं है? ब्रह्मा जी के मंदिर नहीं होने का क्या राज है? ब्रह्मा जी की वंशावली क्या है? कौन है ब्रह्मा जी की पत्नी और बेटी?  इन सभी सवालों के जवाब आज आप इस आर्टिकल में जानने वाले हैं।  तो अंत तक इस आर्टिकल को जरूर पढ़ें हमारा मानना है कि इस आर्टिकल से आपकी जानकारी काफी हद तक बढ़ेगी।

 

दोस्तों, ब्रह्मा जी का विश्व में सिर्फ एक ही मंदिर है और वह राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर शहर में स्थित है. यह मंदिर एक झील के किनारे पर बना हुआ है. इस मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा को भव्य मेला आयोजित किया जाता है और देश-विदेश से काफी श्रद्धालु इस मेले का आनंद प्राप्त करते हैं।  ब्रह्मा जी जो कि इस संसार के रचयिता हैं और उनके अधिक मंदिर ना होना हर किसी के लिए एक प्रश्न चिन्ह है।  आखिर कौन सा राज है जिसकी वजह से ब्रह्मा जी के मंदिर नहीं बन पाए।

 

ब्रह्मा जी का संपूर्ण कुल तथा वंशावली (Brahma Ji ki Vanshavali)

 

 ब्रह्मा जी तीनों त्रिदेवत्व शक्ति में प्रमुख शक्ति है और पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी की आयु अन्य देवताओं से अधिक आयु सीमा निर्धारित है। ब्रह्मा जी की दो पत्निया है  जिनका नाम सावित्री देवी और गायत्री देवी है।  ब्रह्मा जी के एक पुत्री का उल्लेख मिलता है जिसका नाम सरस्वती देवी है।  सरस्वती देवी की पूजा आज विद्या देवी के नाम से की जाती है सरस्वती माता का सृजन स्वयं ब्रह्मा जी ने किया था और संपूर्ण संसार सरस्वती की पूजा विद्या दायिनी के रूप में करता है.

इस देवता के पुत्रों की अगर हम बात करें तो ब्रह्मा जी द्वारा बहुत पुत्रों का सृजन किया गया।  जिनमें मुख्य तौर पर ब्रह्मा जी के मानस पुत्र:- मन से मारिचि, नेत्र से अत्रि, मुख से अंगिरस, कान से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगुषठ से दक्ष, छाया से कंदर्भ, गोद से नारद, इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार, शरीर से स्वायंभुव मनु, ध्यान से चित्रगुप्त आदि पुत्रों का सृजन किया गया।  पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी की वंशावली को और अधिक अध्ययन करने की आवश्यकता है। क्योंकि ब्रह्मा जी के कई ग्रंथों में शस्त्रों पुत्रों का वर्णन होता है और कुछ ग्रंथों में उक्त बताया के पुत्रों का नाम उल्लेखित किया गया है।

 

 आइए जानते हैं ब्रह्मा जी  के मंदिर क्यों नहीं बन पाए (Brahma Ji Ke Mandir Kyu Nahi Hai)

 

दरअसल  ब्रह्मा जी के मंदिर ना बनने की पौराणिक कथा का वर्णन पदम पुराण में यथावत उल्लेखित किया गया है. ब्रह्मा जी के मंदिर नहीं बनने का कारण उनकी पत्नी सावित्री का श्राप था। पदम पुराण के अनुसार एक समय धरती पर वज्रनाश नामक दैत्य का आतंक बहुत बढ़ने लगा था। तब ब्रह्मा जी को सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए वज्रनाश नामक दैत्य का वध करना पड़ा। जब ब्रह्मा जी राक्षस का वध कर रहे थे तब उनके हाथ से कमल पुष्प के तीन भाग धरती पर गिरे और और उस स्थान पर देवत्व शक्ति से झील का निर्माण हुआ। एक झील का नाम पुष्कर झील के नाम से विख्यात हुआ। 

ब्रह्मा जी ने सृष्टि के कल्याण हेतु और मानव जाति को दुष्ट शक्तियों से हमेशा सुरक्षित रखने के उद्देश्य से पुष्कर झील पर यज्ञ अनुष्ठान किया और इस अनुष्ठान में ब्रह्मा जी के साथ सावित्री देवी को भी विराजमान होना अनिवार्य था। जो कि ब्रह्मा जी की पत्नी थी। परंतु किन्हीं कारणों की वजह से  देवी सावित्री यज्ञ स्थल पर समय पर नहीं पहुंच पाई. ब्रह्मा जी को सावित्री की अनुपस्थिति में यज्ञ को संपूर्ण कराना मुश्किल होता जा रहा था। तभी ब्रह्मा जी ने  यज्ञ अनुष्ठान को संपूर्ण करने हेतु एक गुर्जर समाज की कन्या गायत्री देवी से विवाह कर लिया और यज्ञ अनुष्ठान संपूर्ण किया।

जैसे ही यज्ञ संपूर्ण होने जा रहा था तभी सावित्री देवी का आगमन हो गया और सावित्री देवी ने ब्रह्मा जी के बगल में अन्य स्त्री को देखा तो वह बहुत  क्रोधित हुई।  क्रोध के आवेश में आकर सावित्री देवी ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवताओं में श्रेष्ठ होने के बावजूद भी उनकी कहीं पर भी पूजा नहीं होगी और कहीं भी उनका मंदिर नहीं बनेगा। अगर ऐसा कोई करेगा तो उसका विनाश निश्चित है. ब्रह्मा जी के इस यज्ञ में भगवान विष्णु जी ने भी सहयोग किया था। सावित्री देवी ने भगवान विष्णु को भी श्राप दिया कि उन्हें पत्नी के विरह का कष्ट भोगना पड़ेगा. देवी सावित्री का यह  श्राप भगवान विष्णु  को राम अवतार  समय में सीता के विरह रूप में भोगना पड़ा .

 

देवी सावित्री द्वारा ब्रह्मा जी को दिए गए श्राप की वजह से सभी देवता त्रासदी से व्याकुल हो उठे और उन्होंने संसार के संतुलन को बिगड़ते देख माता सावित्री से करबद्ध अनुरोध किया। और कहा, “हे मातेश्वरी  दिया गया श्राप आप वापस ले ले.”  देवी सावित्री का क्रोध इतना तीव्र था कि उन्होंने श्राप को वापस लेने से इंकार कर दिया। देवताओं के करबद्ध अनुरोध को देखते हुए देवी सावित्री ने कहा कि यह श्राप  वापस नहीं हो सकता। बस इतना हो सकता है कि ब्रह्मा जी का मंदिर सिर्फ और सिर्फ पुष्कर में ही रहेगा अन्य किसी स्थान पर ब्रह्मा जी की पूजा या मंदिर का निर्माण नहीं किया जाएगा। अगर ऐसा कोई दूसरा प्राणी करता है तो उसे विनाशक क्षति भोगनी पड़ेगी।  इसी पौराणिक कथा के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा जी का मंदिर अन्य जगह पर क्यों नहीं बन पाया।

 

कहां पर स्थित है ब्रह्मा का आदित्य मंदिर (Brahma Ji ki Aaditya Mandir)

 

ब्रह्मा जी की पूजा सिर्फ और सिर्फ राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पुष्कर क्षेत्र पर ही की जाती है। इसी क्षेत्र पर ब्रह्मा जी का अदित्य मंदिर स्थापित किया गया है।  यह मंदिर अजमेर से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।  यह मंदिर एक झील के किनारे पर बसा हुआ है और यहां पर देश-विदेश से श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है। क्योंकि संपूर्ण विश्व में सिर्फ पुष्कर ही एक ऐसा क्षेत्र है जहां  पर ब्रह्मा जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह मंदिर जयपुर से तकरीबन 150 किलोमीटर और दिल्ली से करीब 437 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

 

ब्रह्मा जी के पांचवे सिर की कहानी (Brahma Ji Ki Kahani)

पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने कामदेव को कठिन तप के फल स्वरुप तीन सिर वरदान के रूप में दे दिए। इन तीनों सिर की सख्ती की वजह से कामदेव किसी को भी आसक्त कर सकते थे। कामदेव ने अपने तीन सिरों की की शक्ति देखने के लिए काम युक्त बाण ब्रह्मा जी पर ही छोड़ दिया। ब्रह्मा जी पर इसका असर हुआ भी और ब्रह्मा जी ने अपनी संकल्प शक्ति से शतरूपा देवी का सृजन किया। ब्रह्मा जी ने अपने द्वारा सर्जन की गई शतरूपा पर आसक्ति की दृष्टि जमाना शुरू कर दी। परंतु शतरूपा ब्रह्मा जी की दृष्टि से बचना चाहती थी। शतरूपा देवी ब्रह्मा जी की दृष्टि से बचने के लिए ऊपर ब्रह्मांड की तरफ छिपने का प्रयास करने लगी। परंतु ब्रह्मा जी का पांच सिर जो कि ऊपर की ओर देखता था। उस दृष्टि से शतरूपा देवी अपने आप को नहीं छिपा पाई।

शतरूपा देवी ब्रह्मा जी की पुत्री समान थी और उनकी आसक्ति की दृष्टि भगवान शिव को अखरने लगी। तभी भगवान शिव क्रोधित होकर ब्रह्मा जी से युद्ध करने पहुंचे और ब्रह्मा जी के पांचवे सिर का जो कि एक घमंड का प्रतीक था। भगवान शंकर ने उस पाचवे शीश का वध कर दिया। इस पाचवे शीश के कट जाने पर ब्रह्मा जी ने अपने यथा स्वरूप का ध्यान किया और भगवान शिव को धन्यवाद किया।  भगवान शिव द्वारा ब्रह्मा जी का काटा गया शीश बद्रीनाथ परिसर में जाकर गिरा और वहां पर ब्रह्म कपाल नाम से एक मंदिर बनाया गया और आज भी वहां पर ब्रह्म कपाल मंदिर के नाम से ब्रह्मा के पांचवे सिर की पूजा की जाती है। यहां पर लोग अपने पितरों के पिंडदान और तर्पण करते हैं और उनके मोक्ष की कामना करते हैं।

 

ब्रह्मा जी की आरती और गाने का उचित समय (Brahma Ji ki Aarti)

 

 ब्रह्मा जी की आरती अगर कोई जन ब्रह्म मुहूर्त में गाता है, तो उसे विशेष फल की प्राप्ति होती है और जीवन में कभी कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।  ब्रह्मा जी की आरती सवेरे ब्रह्म मुहूर्त में की जाती है।  सभी पाठकों को बता दें ब्रह्मा जी का आदित्य मंदिर सिर्फ पुष्कर में ही स्थित है और यहीं पर ब्रह्मा जी की आरती को गाया जाता है।

पितु मातु सहायक स्वामी सखा,

तुम ही एक नाथ हमारे हो।

जिनके कुछ और आधार नहीं,

तिनके तुम ही रखवारे हो ।

सब भॉति सदा सुखदायक हो,

दुख निर्गुण नाशन हरे हो ।

प्रतिपाल करे सारे जग को,

अतिशय करुणा उर धारे हो ।

भूल गये हैं हम तो तुमको,

तुम तो हमरी सुधि नहिं बिसारे हो ।

उपकारन को कछु अंत नहीं,

छिन्न ही छिन्न जो विस्तारे हो ।

महाराज महा महिमा तुम्हारी,

मुझसे विरले बुधवारे हो ।

शुभ शांति निकेतन प्रेम निधि,

मन मंदिर के उजियारे हो ।

इस जीवन के तुम ही जीवन हो,

इन प्राणण के तुम प्यारे हो में ।

तुम सों प्रभु पये “कमल” हरि,

केहि के अब और सहारे हो ।

(Brahma Ji ki Aarti)

Pitu Matu Sahayak Svami Sakha,
Tum Hi Ek Nath Hamare Ho.

Jinake Kuchh Aur Adhar Nahin,
Tinake Tum Hi Rakhware Ho .

Sab Bhati Sada Sukhadayak Ho,
Dukh Nirgun Nashan Hare Ho .

Pratipal Kare Sare Jag Ko,
Atishay Karuna Ur Dhare Ho .

Bhool Gaye Hain Ham To Tumako,
Tum To Hamari Sudhi Nahin Bisare Ho .

Upakaran Ko Kachhu Ant Nahin,
Chhinn Hi Chhinn Jo Vistare Ho .

Maharaj Maha Mahima Tumhari,
Mujhase Virale Budhavare Ho .

Shubh Shanti Niketan Prem Nidhi,
Man Mandir Ke Ujiyare Ho .

Is Jivan Ke Tum Hi Jivan Ho,
In Pranan Ke Tum Pyare Ho Mein .

Tum Son Prabhu Paye “Kamal” Hari,
Kehi Ke Ab Aur Sahare Ho .

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