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भरत मिलाप | Bharat Milap | मनमोहक कथा

Bharat Milap 2022
October 1, 2022

भरत मिलाप – Bharat Milap

आइये जानते है भरत मिलाप Bharat Milap भरत मिलाप क्या है, भरत मिलाप भाइयो के मिलने का उत्सव है इस उत्सव के पीछे बहुत ही रोचक और मनमोहक कथा है, और ये उत्सव भगवान् श्री राम के समय से लगातार आज तक मनाया जाने वाला उत्सव है,

 

भरत मिलाप की मनमोहक कथा – Bharat Milap Ki Manmohak Katha 

भरत मिलाप – Bharat Milap हिन्दुओ का प्रमुख उत्सवों में से एक उत्सव है और यह उत्सव विजया दशमी (दशहरा) के अगले दिन मनाया जाने वला उत्सव है, यानि अश्विनी शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है, माना जाता है की दशहरा के दिन भगवान् श्री राम लंका पति रावण का वध करके और 14 वर्ष का वनवास की अवधि को पूर्ण करके पुनः अयोद्ध्या लौटे थे। 

जब भरत को ये पता चला की माता कैकई उनको राजसिंहासन पर बैठना चाहती है,तो उन्होंने अपनी चाल चल कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिलाया है तो वह अपनी माता से झगड़ा करने लगे और भगवान् श्री राम,लक्ष्मण,और माता सीता को वापस लेने के लिए वन की और चले गए। और वही पर प्रकर्ति की शोभा से युक्त पवित्र स्थल त्रिकूट पर्वत पर रहते हुए प्रभु श्री राम और माता सीता प्रकर्ति का आनंद ले रहे थे,अचानक उन्हें चतुरंगिणी सेना की आने की आहट सुनाई दी,और वन्य पशु इधर-उधर भागते हुए दिखाई दिए। यह देख कर राम ने लक्ष्मण से कहा की ऐसा प्रतीत होता है की इस वन में पशुओ की आखेट हेतु किसी राजा का वे में प्रवेश किया है तुम जा कर पता लगाओ। 

लक्ष्मण तुरंत ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गए, और देखा की एक विशाल सेना हाथी,घोड़े,शास्त्र से सुसज्जित हो कर चली आ रही है जिसके आगे अयोध्या का पताका लहरा रहा था। लक्ष्मण समझ गए की ये आयोध्या की सेना है, राम के पास आकर लक्ष्मण ने राम से कहा की अयोध्या की सेना हमारी और चली आ रही है, लगता है की कैकई का पुत्र भरत अपनी सेना लेकर सीधा चला आरहा है लगता है की वो हमे वन में अकेला पा कर हमारा वध करना चाहता है और अयोध्या का राजा बनना चाहता है,और अयोध्या पर अपना राज करना चाहता है, मैं उसे उसके पापो का फल चखाउंगा ,

राम ने लक्ष्मण को प्रेम पूर्वक समझाया की तुम ये सब गलत कह रहे हो क्योंकिं भारत तो मुझे अपने प्राणो से भी अधिक प्रिय है वो ऐसा नहीं कर सकता तुम भरत केलिए ऐसे कठोर शब्द मत बोलो,राम की मधुर वचन सुनकर लक्ष्मण ने कहा प्रभु सेना के साथ पिता जी का सफ़ेद छत्र नहीं दिखा तो मुझे सनका हुई,

पर्वत के पास भरत अपनी सेना को छोड़ कर शत्रुघ्न के साथ भगवान् श्री राम की कुटिया में प्रवेश किया, और देखा की मृगछाला पर जाता धारी राम वक्कल धारण किये हुए बैठे है, वे राम के चरणों में गिर कर रोने लगे,राम उठे और अपने दोनों भाइयो को गले लगाया को माता – पिता कुशलता के बारे में उनसे पूछा,

राम के ये वचन सुन कर भरत ने राम से कहा भैया हमारी धर्मपरायण पिताजी स्वर्ग सिधार गए है,मेरी माता कैकई ने जी पाप कर के मुझपर जी कलंक लगाया है जिसके कारन मै किसी को भी अपना मुख नहीं दिखा सकता। इसीलिए में आप की शरण में आया हु आप अयोध्या का राज संभाले और मेरा उद्धार करें और मुझ पर लगा हुआ ये कलंक को मिटाये। सम्पूर्ण मंत्री मंडल,तीनो माताएं,गुरु वशिष्ठ आदि यही प्रार्थना लेकर आप के पास आये है, मै आपका छोटा बही हूँ,पुत्र के सामान हूँ,माता कैकई ने जो कलंक मेरे माथे पर लगाया है उस कलंक को धो कर मेरी रक्षा करें। जब इन दोनों भाइयो का मिलान हुआ तो ये दोनों एकदूसरे से गले मिलकर रोने लगे। यह दृश्य बहुत ही ह्रदय विदारक था,भरत ने राम से कहा की अयोध्या पर राज करने का अधिकार केवल आपको ही है,प्रभु आप की जगह कोई और नहीं ले सकता और भरत ने राम से पुनः अयोध्या चलने की जिद्द की परन्तु राम पुनः नहीं लौटे। 

इसी दृश्य ने भाइयो के बीच के अलौकिक प्रेम को दर्शया है, तब राम ने कहा की मैंने अपने पिता जी से 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर ही लौटने का वचन दिया है, तो में अपने पिता जी को दिया गया वचन नहीं तोड़ सकता, इसी लिए में 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करके जी पुनः लौटूंगा। तब भरत भगवान् श्री राम की चरण पादुका को अपने सर पर रख कर वापस अयोध्या के लिए लौट गए। और भगवान् श्री राम की चरण पादुका को राजसिंहासन पर रख कर अपने राज्ज्य का राजकाज सँभालने लगे 

भरत मिलाप का महत्त्व – Bharat Milap Ka Mahatva 

भरत मिलाप  Bharat Milap उत्सव भाइयो के बीच के प्रेम,एकता,एकदूसरे के प्रति सद्भावना,और सम्मान का प्रतिक के रूप में मनाया जाने वाला हिन्दुओ का मुख्या उत्सव है, जो की 

अश्विनी शुक्ल की दशमी के अगले दिन मनाया जाता है, इसके पीछे ऐसी पौराणिक मांन्यता है की इसी दिन भगवान् श्री राम लंकापति रावण का वध करके पुनः अयोध्या लौटे थे वो दिन दशहरा का दिन था। उसके अगले दिन वह अपने भाई भरत से मिलने गए थे,और दोनों रकदूसरे के गले लगकर रोने लगे,तभी से आज तक दशहरा के अगले दिन एकदूसरे से मिलने का दिन होता है और ये पौराणिक परंपरा आज भी चली आरही है।  

 

 

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