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Aadi Perukku 2021 | आदि पेरुक्कु 2021 शुरू, कब और कैसे मनाया जाता है

आदि पेरुक्कु 2021
July 24, 2021

आदि पेरुक्कु 2021 कब है?

 आदि पेरुक्कु दक्षिण भारत का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। इस पर्व को मनाने से ही अन्य पर्वों की शुरुआत हो जाती है। दक्षिणी भारत में आदि पेरुक्कु पर्व को बड़ी श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता हैं। दक्षिण भारत की मान्यता है कि जब जल नदियों में उफान लाता है तब ही दक्षिण भारत की उन्नति तथा सम्पन्नता आती है। दक्षिणी भारत की प्रसिद्ध नदी कावेरी इस पर्व का मुख्य स्रोत है। कावेरी के तट पर ही आदि पेरुक्कु पर्व मनाया जाता है। इस पर्व के माध्यम से कावेरी नदी का भक्ति भाव के साथ आभार व्यक्त किया जाता है। ये त्यौहार तमिल महीने के 18 वें दिन मनाया जाता है।

किसान वर्ग इस त्यौहार को ज्यादा मनाते हैं क्योंकि यह त्यौहार मानसून से संबंधित है और कावेरी नदी दक्षिण भारत के किसानों की संजीवनी है। इस वर्ष आदि पेरुक्कु पर्व मंगलवार 3 अगस्त 2021 को मनाया जाएगा। आदि पेरुक्कु  पर्व तमिल पर्वों में खास महत्व रखता है। इस दिन सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। तथा नदी झील आदि के किनारों पर इस त्यौहार को धूमधाम से मनाया जाता है।

आइए जानते हैं आदि पेरुक्कु व पैरों का महत्व तथा इसे किस तरह से बनाया जाता है? और इसे मनाने का क्या कारण है? यह सभी जानकारी विस्तार पूर्वक आप इस लेख में जानने वाले हैं। अतः आप संपूर्ण विवरण ध्यानपूर्वक पढ़ें।

आदि पेरुक्कु पर्व का महत्व

 जैसा कि उक्त पंक्तियों में आपको बता दिया गया है कि आदि पेरुक्कु पर्व  दक्षिणी भारत का  महत्वपूर्ण पर्व है और यह पर्व है प्रकृति से जुड़ा हुआ है। अर्थात मानसून और वर्षा ऋतु से जुड़े होने के कारण इस पर्व को किसान वर्ग अधिक मनाते हैं। मान्यता है कि इस दिन कावेरी नदी अपने उफान पर होती है और कावेरी नदी के उफान से ही दक्षिणी भारत अपनी उपजाऊ बड़ा पाता है। आदि पेरुक्कु पर्व का खासा महत्व कावेरी नदी के प्रति आभार प्रकट करना है।

इस पर्व के दिन महिलाएं दीप प्रज्वलित करके पान के पत्तों पर रखकर उसे पानी में छोड़ दिया जाता है।पकवान आदि का भोग लगाकर नदी के किनारे या झील के किनारे बैठ कर भोजन ग्रहण किया जाता है। इस पर्व को किसान वर्ग के अलावा अन्य वर्ग के लोग पिकनिक के तौर पर मनाते हैं। श्रावण महीने में संपूर्ण दक्षिणी भारत में चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है। तथा सभी नदी तालाब झील अपने उफान पर होते हैं। ये दृश्य बड़ा मनोहरम बनता है। इस दौरान मॉनसून के कारण नदी में पानी काफी होता है, जो कि स्थानीय लोगों के लिए सुख-समृद्धि लेकर आता है। यह त्योहार किसानों द्वारा विशेष तौर पर मनाया जाता है। किसानों का जीवन पानी पर निर्भर है। इस खास मौके पर महिलाएं देवी पचई अम्मा की पूजा-अर्चना करती हैं।

 आदि पेरुक्कु पर्व कब और कैसे  मनाते हैं?

जैसा कि आप जानते ही चुके हैं कि आदि पेरुक्कु पर्व एक तमिल पर्व है और इसे तमिल महीने के 18 वें दिन मनाया जाता है। वर्ष 2021 में आदि पेरुक्कु पर्व 3 अगस्त 2021 मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। इस पर्व को अधिकांश किसान वर्ग तथा खेती से जुड़े लोग ही ज्यादा आस्था के साथ मनाते हैं। पूर्व के दिन सभी श्रद्धालु गण झील या कावेरी नदी के किनारे इकट्ठा होते हैं। कावेरी नदी दक्षिणी भारत की सबसे बड़ी और समृद्ध रूपी नदी है। इस नदी के उफान से तथा बहने से किसान वर्ग को खेती में बहुत अधिक फायदा होता है। इसी वजह से खेती किसानी से जुड़े लोग माता कावेरी नदी की आस्था के साथ पूजा अर्चना करते हैं। तथा अपने ऊपर माता कावेरी के किए गए आभार को व्यक्त करते हैं। दक्षिण भारत की इस पर्व को लेकर मान्यता है इस दिन मानसून अपने चरम पर होता है।  और सभी नदी झील तालाब आदि भर चुके होते हैं और खेती उपयुक्त जल इकट्ठा हो चुका होता है। महिलाएं बच्चे बूढ़े बुजुर्ग दीप प्रज्वलित करके पान के पत्तों पर रखकर उसे जल में प्रवाहित करते हैं। इस दिन महिलाएं बड़े धूमधाम से देवी पचई अम्मा और वरुणा देवी की पूजा-अर्चना करती हैं। वरुणा देवी जोकि वर्षा की देवी है। देवी से प्रार्थना की जाती है ताकि क्षेत्र में अधिक बारिश हो और पैदावार ज्यादा से ज्यादा बढ़ सके।

जो लोग खेती किसानी से संपर्क नहीं रखते तथा शहर में निवास करते हैं। वह सभी लोग पिकनिक मनाने के उद्देश्य से कावेरी नदी के किनारे जाकर इस पर्व का आनंद लेते हैं और अपना पिकनिक इंजॉय करते हैं। जो भी लोग इस पर्व में शामिल होते हैं तथा वहां पर इकट्ठा होकर भोजन ग्रहण करते हैं, उन्हें माता का आशीर्वाद प्राप्त होता। माता कावेरी नदी के तट पर इस भव्य पर्व को संपन्न किया जाता है। 

दक्षिण भारत में ऐसी मान्यताओं के चलते तथा मानसून की वृद्धि प्रार्थना हेतु आदि पेरुक्कु पर्व मनाया जाता है। यह पर्व पूर्णता धार्मिक प्रवृत्ति से मनाया जाता है, और सभी लोग श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ प्रकृति की देवी की पूजा अर्चना करते हैं। तथा अपने क्षेत्र तथा राज्य की समृद्धि के लिए कामना करते हैं।

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