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Surya Grahan | जाने सूर्य ग्रहण 2021 में कब है , यह कब और क्यों होता है और पौराणिक कथा

सूर्य ग्रहण
March 15, 2021

जानिए सूर्य ग्रहण 2021 से संबंधित पूरी जानकारी, किस तरह इस दिन किसी को वश में किया जा सकता है, यह कब और क्यों मनाया जाता है, वर्ष 2021 में कब होगा सूर्य ग्रहण और इससे जुड़ी पौराणिक कथा

वैदिक काल से पहले ही खगोलीय संरचना पर अध्ययन होना शुरू किया जा चुका था। हिंदू धर्म में सूर्य ग्रहण बहुत महत्ता रखता है। सूर्य ग्रहण पर शोध और प्रशिक्षण प्राचीन काल से चलते आ रहे हैं जिसके बारे में ज्योतिष और धार्मिक ग्रंथो में इसकी वैदिक, वैज्ञानिक और धार्मिक विवेचना देखने को मिलती है। सूर्य ग्रहण लगने के पीछे पौराणिक कथा भी प्रचलित है जोकि राहु और केतु से संबंध रखती है। माना जाता है कि सूर्य ग्रहण के समय सूर्य कष्ट में होता है। लेकिन अन्य देशों में इसका वैज्ञानिक महत्व ज्यादा है क्योंकि यह ऐसा समय होता है जिसमें शोध करने के नए नए अवसर मिलते हैं। 

प्राचीन ऋग्वेद के अनुसार महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण का ज्ञान देने वाले पहले शिक्षक थे। इनके कुटुंब को भी खगोल विद्या का ज्ञान था। वर्तमान समय में वैज्ञानिक ग्रहण के समय में सूर्य व उसके पास की चीजों को अध्ययन कर नए जानकारी दुनिया के समक्ष लाने की कोशिश करते हैं। ज्योतिष विद्या के अनुसार यदि सूर्य ग्रहण के बारे में जानने का प्रयास किया जाए तो यह एक खगोलिय घटना माना जाता है जिससे कि मनुष्य के जीवन का इसका काफी प्रभाव पड़ता है। इसे अशुभ मानने के कारण ही घटना के रूप में इसे प्रदर्शित किया जाता है। जब सूर्य को ग्रहण लगता है तो वह पृथ्वी के कुछ क्षेत्र में ही दिखाई देता है। वहीं चंद्रमा पृथ्वी के ज्यादा निकट होेता है इसलिए ज्यादा क्षेत्र में प्रत्याक्ष होता है। आइए जानें कि कब सूर्य ग्रहण लगता है।

 

जानिए सूर्य ग्रहण कब लगता है? -सूर्य ग्रहण 2021 (Solar Eclipse)

चंद्रमा द्वारा सूर्य के बिम्ब को ढक देने के कारण जब पृथ्वी पर सूर्य की किरणों का आना रूक जाता है उस समय सूर्य ग्रहण लगता है। लेकिन मान्ताओं के अनुसार राहु और केतु को सूर्य और चंद्रमा का शत्रु माना जाता है। जब यह दैत्य अमावस्या के दिन सूर्य का ग्रास कर लेता है तो सूर्य ग्रहण लग जाता है। अमावस्या के दिन हुई इस घटना में सूर्य का प्रकाश रूक जाने के समय ग्रहण लगता है। वैज्ञानिक विद्या के आधार पर जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक रेखा में आ जाते हैं, उस समय सूर्य ग्रहण लगता है। वर्ष में यदि दो ग्रहण हो रहें हैं तो वह दोनों सूर्य ग्रहण ही होंगे। सूर्य ग्रहण के बारे में संक्षेप में जानने से पहले उसके प्रकार, कैसे लगता है, क्यों लगता है और इस दिन हमें क्या क्या करना चाहिए।

 

तीन प्रकार के सूर्य ग्रहण (Types of Solar Eclipse)

सूर्य ग्रहण तीन प्रकार से लगता है जिसमें चंद्रमा के पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाने की स्थिति अलग अलग होती है। तीनों प्रकार के ग्रहण मनुष्य जीवन को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं। तो आइए इसके बारे में जानते हैं।

  • पूर्ण सूर्य ग्रहण

यह ग्रहण तब लगता है जब चंद्रमा पृथ्वी परिक्रमा करते समय सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है। इससे सूर्य से पृथ्वी पर पड़ने वाला प्रकाश रूक जाता है और पृथ्वी के कुछ क्षेत्र में अंधकार छा जाता है। ग्रहण के समय पृथ्वी पर चंद्रमा की छाया पड़ती है। जिसे पूर्ण सूर्य ग्रहण का नाम दिया गया है क्योंकि इसमें सूर्य का पूर्ण भाग ग्रहण ग्रास में होता है।

  • आंशिक सूर्य ग्रहण

इस ग्रहण के समय भी चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है लेकिन इस प्रकार के ग्रहण में चंद्रमा का कुछ भाग ही छाया का कारण बनता है। इसमें सूर्य का कुछ हिस्सा देखा जा सकता है। आंशिक सूर्य ग्रहण को यह नाम तभी दिया गया है क्योंकि इस समय काल में सूर्य का कुछ अंश ग्रहण ग्रास से अप्रभावित होता है। 

  • वलयाकार सूर्य ग्रहण

इस प्रकार का ग्रहण बहुत ही कम देखने को मिलता है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा अंडाकार कक्ष में करता है जिसके फलस्वरूप चंद्रमा पृथ्वी से कभी अधिक और कभी कम दूरी पर होता है। इस ग्रहण के समय चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच में होता है और सूर्य के मध्य में होने के कारण बीच वाले प्रकाश को आने से रोकता है। इसलिए सूर्य की परिधि से निकलने वाला प्रकाश एक वलय व कंगन के समान प्रतीत होता है। सूर्य के कंगन की भांति बने प्रकाश के आकार की वजह से ही इसे वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा जाता है। 

 

क्यों और कैसे लगता है ये ग्रहण ?

पौराणिक कथाओं के अनुसार राहु और केतु द्वारा सूर्य और चंद्रमा को ग्रास करने के कारण सूर्य व चंद्र ग्रहण लगता है। अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण लगता है क्योंकि इस समय यह दानव सूर्य का ग्रास करने में सफल हो जाते हैं। इसी प्रकार चंद्रमा को पूर्णिमा के दिन ग्रहण लगता है। इन दैत्यों द्वारा सूर्य और चंद्रमा को अपना शत्रु मानने के पीछे एक कारण है जिसका पता पूरी कथा को जानने के बाद लगता है, इसलिए इसके बाद हम आपको उस कथा के बारे में विस्तार से बताएंगे। 

वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो सूर्य ग्रहण के लगने का कारण ग्रहों और उपग्रहों की निरंतर होती गति है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और हमारी पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है जिससे कि चंद्रमा का किसी समय में सूर्य और पृथ्वी के बीच में आना निश्चित है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा के साथ साथ अपने अक्ष पर भी लगातार घूमती रहती है। जिसके कारण ग्रहण अलग अलग स्थानों पर अलग समय में देखने को मिलता है।  

 

सूर्य ग्रहण 2021 – जाइये इस वर्ष केसा रहेगा 

वर्ष 2021 में दो बार सूर्य ग्रहण का दिन आने वाला है जिसमें 10 जून को इस साल का पहला सूर्यग्रहण देखने को मिलेगा। इस ग्रहण को भारत के साथ साथ रूस, कनाडा, यूरोप, ग्रीनलैंड और उत्तरी अमेरिका में यह ग्रहण देखने को मिलेगा। 

इसी के साथ साल का दूसरा और अंतिम 4 दिसंबर को लगेगा। जिसे भारत से देखना संभव नहीं है। यह ग्रहण दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और अंटार्कटिका में यह ग्रहण दिखाई देगा। 

 

पढ़िए सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा  (Surya Grahan Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार जिस समय समुद्र मंथन की प्रक्रिया चल रही थी। उस समय देवताओं और दैत्यों ने मिलकर अमृत पान की कामना से मिलकर कार्य किया था। जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत प्रकट हुआ तो देवताओं और दानवों के बीच में विवाद आरंभ हो गया कि कौन इसको पहले ग्रहण करके अमरता प्राप्त करेगा। इस विवाद का समाधान निकालने के लिए भगवान श्री विष्णु जी ने मोहिनी नामक अप्सरा का रूप धारण कर लिया। भगवान ने धारण किए किए आकर्षित रूप की सहायता से सभी देवताओं और दैत्यों को अलग अलग पंक्ति में बैठा दिया।

भगवान की इस चाल का ज्ञान उस समय एक राक्षस को हो गया और तब वह दैत्य देवता का रूप धारण करके छल से देवताओं की पंक्ति में आकर बैठ गया। उस दैत्य को रूप धारण करते समय सूर्य और चंद्रमा ने देख लिया था और इसके बारे में इन्होंने भगवान श्री विष्णु को बता दिया। लेकिन जब तक श्री हरि को इस बात का पता लगा तब तक वह अमृत पान कर चुके थे। जिससे कि उन दैत्यों को अमरता का वरदान प्राप्त हो चुका था। 

लेकिन भगवान ने क्रोध में आकर उस दैत्य पर अपने सुदर्शन चक्र से प्रहार किया। जिससे कि उसका धड़ और शरीर अलग हो गया। उस दैत्य के धड़ वाले भाग को आज केतु के नाम से जाना जाता है और सिर को राहु कहा जाता है। उस दैत्य को पता चल गया कि उसकी इस दुर्दशा का कारण सूर्य और चंद्र देव हैं। तभी से राहु और केतु इन दोनों देवताओं को अपना शत्रु मानने लग गए। इसी कारण से सूर्य और चंद्रमा को यह ग्रास करने का प्रयास करते रहते हैं और अमावस्या और पूर्णिमा के समय यह इसमें सफल हो जाते हैं। इसलिए सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगता है। 

 

सूर्य ग्रहण के समय क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिए?

हिंदू धर्म में सूतक और ग्रहण के समय किसी भी तरह की पूजा व आराधना को करना निषेध माना गया है। मान्ताओं व ज्योतिष विद्या के अनुसार सूतक के लग जाने के बाद ही ग्रहण लगता है।

सूर्य ग्रहण को सीधे आंखों द्वारा देखने से बचना चाहिए। इसके बजाय आप पानी में बने सूर्य ग्रहण के प्रतिबिंब को देख सकते हैं। आंखों को शीशे की सहायता से छिपाकर आप इस अद्भुत दृश्य को देखकर अनुभव कर सकते हैं। 

 

सूर्य ग्रहण पर वशीकरण के टोटके

किसी व्यक्ति द्वारा अन्य महिला या पुरुष को अपने अधीन करने के लिए इन टोटकों किया जाता है। जिस समय मनुष्य को किसी को अपनी ओर सम्मोहित करने आवश्यकता या अभिलाषा होती तो यह वशीकरण के टोटकों अपनाया जाता है। इस वशीकरण के टोटके को किसी पर भी किया जा सकता है। 

किसी को भी शीघ्रता से वश में करने के लिए महाकाल के शाबर मंत्र को बहुत उपयोगी माना गया है। इसके पूर्ण अनुष्ठान का पालन करने के लिए किसी विशेषज्ञ की सहायता लेना बहुत आवश्यक है क्योंकि किसी गलती से इसका प्रभाव खत्म हो सकता है।

 

“सात् पूनम् कालका 12 वर्ष क्वांर एको देवी जानिए् चैदह भुवन् द्वार।

द्विपक्षे निमर्लिए 13 देवन देव अष्टभुजी पर्मेश्र्वरी 11 रूद्र सेव।।

16 कला संपूर्णी तीन नयन भरपूर दशों द्वारी तू ही माता पांचो बाजे नूर।

नई निदि षट्दर्शनी 15 तिथि जान चारों युग में काल का कर काली कल्याण।। ”

 

इस मंत्र की सिद्धि के लिए दीपावली, होली या ग्रहण का समय होना बहुत आवश्यक है। इस मंत्र की सिद्धी प्राप्त होने के बाद मात्र तीन बार इस मंत्र का उच्चारण करने से यह कार्य करना आरंभ कर देगा। इसकी सिद्धी प्राप्त करने के लिए बहुत लंबे समय तक इसके अनुष्ठानों का पालन करके इस मंत्र का जाप करना पड़ता है।

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