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पोहेला बोइशाख कब है ? रीति-रिवाज और इसका क्या महत्व है। Pohela Baisakhi

पोहेला बोइशाख
April 8, 2021

जानिए पोहेला बोइशाख कब और क्यों मनाई जाती है, वर्ष 2021 में इसे कब मनाया जाएगा,  रीति-रिवाज और इसका क्या महत्व है?

 

पोहेला बोइशाख बंगाल में मनाए जाने वाला प्रसिद्ध त्योहार है। इसे बंगाली लोग नव वर्ष के रूप में मनाते हैं। यह वैशाख का प्रथम दिवस होता है, इस समय लोग शुभो नोबो बोरसो बोलकर एक दूसरे को नव वर्ष की बधाई देते हैं। बंगाली भाषा में शुभो नोबो बोरसो का अर्थ होता है आपको नया साल मुबारक हो। 

 

पश्चिम बंगाल और असम राज्य में इस दिन अवकाश होता है। यह दिवस बांग्लादेश के लोगों के लिए भी बहुत विशेष होता है। भारत के कई क्षेत्रों में इस दिन वैशाली के मेले लगाए जाते है। जिसमें भारी संख्या में लोग दिखाई देते हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इस दिन का माहौल देखने वाला होता है, लोग पूरे उत्साह और धूमधाम से इस पर्व को मनाते दिखाई देते हैं। 

 

पोहेला बोइशाख कब और क्यों मनाते हैं? (Pohela Baisakhi Kab Hai )

बंगाली लोगों के लिए चैत्र का महीना साल का पहला माह माना जाता है। इसलिए पोहेला बोइशाख नए साल के रूप में मनाया जाता है। वैशाख माह के पहले दिन पोहेला बोइशाख का पर्व मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह पर्व 14 या 15 अप्रैल के आसपास मनाया जाता है।  

 

वर्ष 2021 पोहेला बोइशाख और मुहूर्त (Pohela Baisakhi Muhurat )

साल 2021 में यह बंगाली त्योहार 15 अप्रैल को गुरुवार के दिन मनाया जाता है। 

बंगाली युग 1428 प्रारम्भ।

पोहेला बोइशाख के उत्सव पर संक्रांति के मुहूर्त का क्षण 14 अप्रैल को रात 2 बजकर 48 मिनट पर आएगा। 

 

यह दिन शादी विवाह, मुंडन, घर खरीदना या गृह-प्रवेश के लिए शुभ होता है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करके पूजा पाठ में लग जाना चाहिए। पूरी आस्था और अनुष्ठानों का पालन करके की गई पूजा से बहुत लाभ होता है।

 

पोहेला बोइशाख कैसे मनाया जाता है?

इस पर्व से कुछ दिन पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती है। सभी बंगाली लोग अपने अपने घरों की सफाईयों में लग जाते हैं। व्यापारी लोग इस दिन पुराना हिसाब किताब कर, नया लेखा जोखा शुरू कर देते हैं। पोहेला बोइशास के समय पाठों का आयोजन किया जाता है। इस दिन लोग पूजा करके और घरों में नए नए पकवान बनाकर इस दिन को मनाते हैं। 

 

मान्यताओं के अनुसार इस दिन की गई पूजा से समृद्धि प्राप्त होती है। इसी के साथ साथ जीवन में आने वाली समस्याएं कम हो जाती है। इसलिए इस दिन को पूजा-पाठ करके मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर लोग मंदिरों की सफाई करके पूजा स्थलों को सजाना आरंभ कर देते हैं। 

 

इस दिन को परंपराओं का पालन करके मनाया जाता है। बंगाल में इस पर्व से जुड़ी कई कई परंपराएं और अनुष्ठान है। इस दिन बड़ो से आर्शीवाद लिया जाता है और गौ माता को स्नान करवाया जाता है। जिसके बाद माता जी का पूजन किया जाता है। माता भगवती के पूजन की प्रथा बंगाल में प्राचीन काल से चली आ रही हैं। आज भी इस दिन को माता भगवती का पूजन किए बिना नहीं मनाया जाता है। 

 

वहीं दूसरी ओर पोहेला बोइशास के दिन बंगाल में मेलो का आयोजन किया जाता है। गोष्ठी मेलों में महिलाएं पीले रंग की साड़ियां पहने हुए दिखाई देती है और पुरूष इस दिन कुर्ता’-धोती पहन कर मेले में शामिल होते हैं। शाम के समय बोइशास के मेलों का आयोजन किया जाता है। 

 

पोहेला बोइशाख से जुड़े रिति रिवाज

  • इस दिन लोगों द्वारा राधा और कृष्ण जी की प्रतिमाओं को गोष्ठी मंडप में स्थापित किया जाता है। जिसके बाद एक साथ मूर्तियों का पूजन किया जाता है। 

 

  • वैशाख के इस दिन सुबह जल्दी उठकर पुआल जलाने की परंपरा है। माना जाता है कि इस पुआल में आहुति देने से पूरा वर्ष खुशियों से भर जाता है। इस दिन को भक्त भजन कीर्तन करके मनाते हैं।

 

  • बंगाल की मान्यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य को देखना चाहिए, ऐसा करना शुभ माना गया है। 

 

  • इस दिन हिल्सा मछली के साथ पांता भात खाने का रिवाज है। 

 

  • बंगाल के लोगों द्वारा इस दिन भगवान गणेश जी, माता लक्ष्मी जी और बादलों की पूजा की जाती है। अच्छी बारिश की कामना से बादलों को जाता है। 

 

पोहेला बोइशाख का महत्व

बंगाली लोगों के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। बंगाली मान्यताओं के अनुसार यह दिन बहुत ही पवित्र होता है। पोहेला बोइशाख के पर्व पर वैशाख का पहला दिन होता है। इसी त्योहार से बंगालियों के लिए नया साल आरंभ हो जाता है। इस दिन को पूरी आस्था से मनाया जाता है और मन में बुरे विचारों को नहीं लाया जाता है। 

 

वहीं बांग्लादेश में पोहेला बोइशास पर सांस्कृतिक दल छायानट कार्यक्रम का शुभारंभ करता है। सन् 1961 में इस छायानट की शुरुआत हुई थी। इस दिन छेने की मिठाई जरूर बनाई जाती है। वहीं बांग्लादेश में कई स्थानों में इस दिन मंगल शोभायात्रा भी निकाली जाती है। इस त्योहार के साथ साथ यह दिन भी बहुत महत्वपूर्ण दिन है, क्योंकि सिख समुदाय के लिए यह बैसाखी और केरल के लोगों के लिए यह विशु पर्व होता है। पोहेला बोइशाख भारत में त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए विशेष होता है। 

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