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गुप्त नवरात्रि 2022, कलश स्थापना एवं मुहूर्त, 9 माताओं के नाम और दस महाविद्याएं व रूप और उनके महत्त्व

गुप्तनवरात्रि मुहूर्त 2022
January 24, 2022

गुप्त नवरात्रि 2022  एवं मुहूर्त

जानियें गुप्त नवरात्रि 2022 , मुहूर्त, कलश स्थापना एवं 9 माताओं के नाम और दस महाविद्याएं व रूप और उनके महत्त्व – हिंदू धर्म में माघ महीने में आने वाली गुप्त नवरात्रि का विशेष महत्त्व है। साल में चार नवरात्रि के पर्व आते हैं जिसमें दो गुप्त नवरात्रि होती है और दो सामान्य होती हैं। सामान्य नवरात्रि पर्व की तिथियों का ज्ञान सभी को होता है लेकिन गुप्त नवरात्रि के बारे में ज्यादातर लोगों का पता नहीं है। इस में माता के नौ रूपों की पूजा से ज्यादा दस महाविद्याओं के पूजन पर विशेष ध्यान लगाया जाता है। इस दस महाविद्याओं के बारे में हम आपको विस्तार से बताएंगे। तंत्र साधना के लिए इसे विशेष माना जाता है जिसमें शनि के बुरे प्रभावों, गृह कलेशों और भूत-प्रेत संबंधित समस्याओं आदि का नाश किया जाता है।

 

गुप्त नवरात्रि 2022 

इस नवरात्रि में गोपनीय रखी जाने वाली पूजा में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है और दस महाविद्याओं का पूजन अलग से किया जाता है। इन दस माता को केन्द्रित रखकर गुप्त नवरात्रि की पूजा को किया जाता है और व्रत रखा जाता है। जिससे दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति होती है। इसे शाकम्भरी नवरात्रि भी कहा जाता है इस नवरात्रि के बारे में ज्यादा जानकारी आसानी से नहीं मिल पाती है। इसकी पूजा विधि और तांत्रिक मंत्रो को मात्र पुस्तकों में खोजा जा सकता है जोकि आसानी से नहीं मिलती क्योंकि इसे गुप्त रखा जाता है। विधि, पूजा और मंत्रो को गुप्त रखने का यह कारण माना जाता है कि इसके बारे में पता लग जाने से पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं हो पाती है। 

वर्ष 2022  में यह पर्व 02 फरवरी बुधवार  के दिन आरंभ हो जाएगा और 10 फरवरी गुरुवार  के दिन यह समाप्त हो जाएगी। माना जाता है कि इन दिनों में रात के समय सुनसान जगहों पर नहीं घूमना चाहिए। अर्धरात्रि में इसकी पूजा करते किसी को देख लेने से भयंकर दोष लगते हैं और जिसके कारण कुछ लोग अपना दिमागी संतुलन तक खो बैठते हैं। आज हम आपको इस गुप्त रात्रि की उस पूजा विधि के बारे में बताएंगे जिसे सात्विक लोग कर सकते है। इस पूजा की  विधि सामान्य नवरात्रि की तरह होती है मात्र माता के नौ रूप की जगह आपको दस अन्य महाविद्याओं व रूपों की अराधना करनी होती है।

 

9 माताओं के नाम और दस महाविद्याएं और महत्त्व

यह नौ रूपों को मां पार्वती का ही रूप माना जाता है। माता के नौ रूपों के नाम इस प्रकार से हैंः

  1. मां शैलीपुत्री 
  2. मां ब्रह्मचारिणी 
  3. मां चंद्रघंटा
  4. मां कूष्मांडा 
  5. मां स्कंदमाता
  6. मां कात्यायनी 
  7. मां कालरात्रि 
  8. मां महागौरी 
  9. मां सिद्धिदात्री 

हम दुर्गा माता के इन नामों के महत्त्वों का वर्णन सामान्य नवरात्रि के पर्व आने पर करेंगे। अभी गुप्त नवरात्रि में पूजा होने वाली देवियों के नामों और महत्त्व को विस्तार से जानते हैं। 

माता के इन दस स्वरूपों की होती है पूजा गुप्त नवरात्रि में 

  1. मां कालिके
  2. तारा देवी
  3. त्रिपुर सुंदरी
  4. भुवनेश्र्वरी
  5. माता चित्रमस्ता
  6. त्रिपुर भैरवी
  7. मां धूम्रवती
  8. माता बगलामुखी 
  9. मातंगी
  10. कमला देवी

प्राचीन कथा

हमारे प्राचीन पुराणों के अनुसार शिव पत्नी सति ने महोदव द्वारा दक्ष यज्ञ में जाने से रोकने पर क्रोधवश काली का रूप धारण किया था। जिससे दस दिशाओं में दस शक्तियां प्रकट हुई थी जिसमें उनके सामने काले रंग की काली थी और उनके नीले रंग को दर्शाति तारा थी। पश्चिम दिशा में छिन्नमस्तिका, शिव के बाएं ओर भुवनेश्वरी, उनके पीछे बगलामुखी, धूमावती की झलक पूर्व-दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, मातंगी की झलक पश्चिम-उत्तर में और षोड़शी शक्ति की झलक उत्तर-पूर्व में थी। त्रिपुर भैरवी की शक्ति मां से साथ शिव के सामने उपस्थित थी। इन भयंकर दृश्य को देखकर भगवान शिव भी भयभीत हो उठे थे। भगवान शिव के काफी यत्न करने बाद वह शांत हुई थी। अंत में उन्होंने इन शक्तियों का प्रयोग दैत्यों और रा़क्षसों के वध के लिए किया था। आइए इनकें बारे में विस्तार से जानें।

  1. माता कालिकाः इन दस महाविद्यायों में काली को प्रथम स्थान दिया जाता है। इस रूप की पूजा सभी से कठिन होती है और इनका अपमान और विधि में गलती करना अपने प्राणों को संकट में डालने के समान होता हैै। माता का यह रूप जितनी जल्दी फल देता है, गलती हो जाने पर उससे भी ज्यादा तीव्रता से विनाश भी कर देता है। माता के इसी रूप ने राक्षसों का विनाश किया था जिसके बाद वह इस प्रकार से प्रचंड रूप में आ गई थी। तभी भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए थे, उनके चरणों में लेटने के बाद उनका क्रोध शांत हुआ था।
  2. ताराः तारा देवी का तांत्रिक विद्या में विशेष स्थान है। सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने दुखों से तारने वाली इस माता की अराधना थी। मोक्ष प्रदान करने वाली इस माता के पूजन से शत्रुओं का विनाश हो जाता है। इनको नयन तारा के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है माता सती के नेत्र तारापीठ में गिरे थे। तारा देवी अराधना से जातकों की हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है।
  3. त्रिपुर सुंदरी: त्रिपुर सुंदरी को ललिता और राज राजेश्र्वरी नाम से भी पुकारा जाता है। पुराणों में इसका उल्लेख है कि माता के वस्त्र भारत के त्रिपुरा राज्य में गिरे थे। त्रिपुरा में त्रिपुर सुंदरी का शक्तिपीठ भी बना हुआ है जिसे कूर्भपीठ कहा जाता है। इनके जाप के नियम काफी कठिन है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
  4. भुवनेश्र्वरीः भुवनेश्र्वरी शताक्षी और शाकम्भरी नामों से प्रसिद्ध हैं। संतान प्राप्ती के लिए लोग इनकी पूजा करते हैं। राजनीतिक अच्छे परिणामों के लिए लोग माता भुवनेश्र्वरी की अराधना करते हैं। इसके आशीर्वाद से धनलाभ में काफी जल्दी से बढ़ोत्तरी होती हैै।
  5. छिन्नमस्ताः इनके गले में हड्डियों की माला होती है और यज्ञोपवीत यानि जनेऊ भी डला होता है। इनके सिर कटे होने के कारण कबंध से खून की तीन धारांह बहती हैं। इनकी पूजा विधि को गोपनीय रखना बहुत आवश्यक है और केवल शांत भावना से ही विधि विधानों को करना चाहिए। शांत स्वभाव से की हुई अराधना से शांत रूप के दर्शन होते है। उग्र रूप के इनके दर्शन को करना बहुत मुश्किल है क्योंकि इनका उग्र रूप काफी भयंकर है।
  6. त्रिपुर भैरवीः इनको बंदीछोड़ माता के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह मनुष्य को सभी बंधनों से मुक्त कर देती हैं। कन्या के विवाह हेतु बाधाएं आने पर भी इनकी पूजा से काफी जल्दी अच्छे परिणाम नजर आते हैं। इसके अलावा इनकी कृपा दृष्टि पड़ने पर इतना धनलाभ होता है कि मनुष्य के मन में इस सांसारिक जीवन से मुक्ति पाने के विचार मन में आने लगते है और वह परम सत्य को देख पाने मे सक्षम हो जाता है।
  7. धूमावतीः धूमावती की अराधना से व्यक्ति निडर हो जाता है और इनका स्वामित्व किसी को प्राप्त नहीं है। इनके आशीर्वाद से शत्रुओं का नाश हो जाता है और भयंकर रोगों तक से मनुष्य निजात पा लेता है। ऋग्वेद में सुतरा नाम से धूमावती का उल्लेख देखने का मिलता है। इनकी पूजा के समय जातकों को हर मोह लोभ को त्यागना पड़ता है। शराब और माँस को पूर्णरूप से छोड़ना पड़ता है अन्यथा इसके काफी बुरे परिणाम हो सकते हैं।
  8. बगलामुखीः महाभारत के समय काल में बगलामुखी की पूजा का वर्णन किया गया है। विजय प्राप्ती के लिए पांडवों ने इनकी पूजा को पूरी विधि विधान से किया था। आज के समय में भारत में बगलामुखी के तीन ही स्थान है जिनको प्रमुख माना गया है। अर्जुन बगलामुखी के उपासक थे, वह प्रत्येक युद्ध के पूर्ण इनकी अराधना करते थे। इनके तीन स्थानों एक स्थान हिमाचल के कांगड़ा जिले मे स्थित और दो मध्यप्रदेश में स्थित हैं।
  9. मातंगीः परिवार और घर स्थिति को बेहतर और समस्याओं के समाधान हेतु मातंगी की पूजा की जाती है। वैशाख शुक्ल की तृतीय को मातंगी की जयंती के रूप में मनाया जाता है। मातंगी के नाम की बात की जाए तो भागवान शिव के नामों में मातंग उनका एक अन्य नाम है। विद्या और संगीत की दुनिया में भी इनके काफी उपासक हैं और इनकी चार भुजाएं होती हैं। इसके अलावा वशीकरण के लिए भी इनकी अराधना की जाती है जिसकी विधी को गोपनीय रखना बहुत आवश्यक है।
  10. कमलाः माता की इस प्रतिमा में श्वेत वर्ण और चार हाथी सूंड से साथ कलश धारण किए खड़े होते हैं। इनके पूजन में इनको स्नान करवाया जाता है और इनकी पूजा मात्र से दरिद्रता, गृहकलेश और अशांति का नाश होता है। इनकी साधना के समय तालाब या जल स़्त्रोंतों में बैठकर कमला देवी का ध्यान लगाया जाता है। व्यापार कर रहें जातकों के इनकी पूजा मात्र से सभी परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है और धन लाभ होता है।

 

गुप्त नवरात्रि के शुभ मुहूर्त 

इस पूजा में शुभ मुहूर्त पर गुप्त रूप से की गई पूजा पर जल्दी ही लाभकारी फल देखने को मिलते हैं। 

इस नवरात्रि पर कलश स्थापना का मुहूर्त सुबह 8 बजकर 34 मिनट से आरंभ होगा और रात 9 बजकर 59 मिनट पर समाप्त हो जाएगा।

इसी के साथ 12 बजकर 13 मिनट पर अभिजीत मुहुर्त आरंभ होकर रात 12 बजकर 58 मिनट पर खत्म हो जाएगा। 

 

निष्कर्ष 

सामान्य नवरात्रि चैत्र और अश्र्विन मास में आती है, इस नवरात्रि पूजन को जोरों शोरों से किया जाता है। गुप्त नवरात्रि का यह पर्व भी साल में दो बार आता है और वर्ष के माघ और आषाढ़ माह में इसे मनाया जाता है। जैसा की गुप्त नवरात्रि के नाम से ज्ञात होता है, इसमें की जाने  वाली पूजा को गोपनीय रखा जाता है। इसमें सात्विक जातक एवं जातिकाएं सामान्य पूजा भी कर सकती हैं। लेकिन तांत्रिक व ज्योतिष पूजा के लिए यह समयकाल उत्तम माना जाता है जिसमें तंत्र मंत्र की सिद्धि के लिए आधी रात में यह पूजा की जाती है। तांत्रिक पूजा का विधि विधान बहुत ही कठिन होता है। इस समय गलत कार्यों से दूरी बनाते हुए श्रद्धा और सात्विकता से पूजा करनी चाहिए। 

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