Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
  • Home ›  
  • Utpanna Ekadashi | उत्पन्ना एकादशी 2021 में कब है, पौराणिक कथा और इसका महत्व

Utpanna Ekadashi | उत्पन्ना एकादशी 2021 में कब है, पौराणिक कथा और इसका महत्व

उत्पन्ना एकादशी 2021
March 13, 2021

आखिर क्यों है खास उत्पन्ना एकादशी, इसे कब मनाया जाता है, उत्पन्ना एकादशी की पौराणिक कथा और इसका क्या महत्व है?

उत्पन्ना एकादशी – हिंदू  ग्रथों में एकादशी के दिवस को भगवान श्री विष्णु के कारण बहुत पवित्र माना गया है। वर्ष में आने वाले 24 से लेकर 26 एकादशी के उत्सव भगवान श्री हरि को बहुत प्रिय होते हैं। प्रत्येक माह में दो एकादशी के उत्सव आते हैं जिसमें एक शुक्ल और दूसरा पर्व कृष्ण पक्ष के चलते मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार अधिकमास व मलमास के आने पर एकादशियों की तिथियां बढ़ जाती है। प्रत्येक एकादशी की अपनी विशेष व्रत कथा होती है। एकादशी के व्रत को सभी व्रतों में सबसे श्रेष्ठ माना गया है। 

एकादशी के शुभ अवसर पर अनंत फल प्राप्ति हेतु पूजा, पाठ और व्रत आदि को शुभ मुहूर्त में ही करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सूर्योदय के आधार पर दिनों की गणना की जाती है। इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से एकादशी तिथि की अवधि दो दिनों के बीच रहती है। एकादशी के दिन रखे गए व्रत को एकादशी के पारण मुहूर्त में खोलना चाहिए। पुराणों में इस मुहूर्त में खोला गया व्रत संपूर्ण माना गया है। इसलिए इन मुहूर्तों और कथाओं का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। तो आइए जानते हैं कि वर्ष 2021 में यह किस दिन आएगा और इसे कब मनाया जाता है।

 

उत्पन्ना एकादशी कब मनाई जाती है? 

उत्पन्ना एकादशी वह पर्व है जिसे मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष आने वाले इस उत्सव पर नारायण जी का पूजन किया जाता है। भगवान श्री विष्णु को अलग अलग 108 प्रकार के नामों से जाना जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह नवंबर या दिसंबर के समीप आती है।

 

वर्ष 2021 की उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi Kab Hai)

उत्पन्ना एकादशी का हरि का दिन कहा जाता है और वर्ष 2021 में यह मंगलवार के दिन आने वाली है। यह एकादशी 30 नवबंर को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत तोड़ने के लिए शुभ समय अर्थात पारण मुहूर्त की अवधि 1 घंटा 28 मिनट की रहेगी। 

साल 2021 की उत्पन्ना एकादशी का पारण मुहूर्त एक दिसंबर को बुधवार की सुबह 7ः34 से 9ः02 बजे तक रहेगा। सुबह का यह समय व्रत खोलने के बहुत शुभ है। 

इस वर्ष की एकादशी की तिथि का समय 30 नवंबर को सुबह 4ः13 बजे आरंभ हो जाएगा और अगले दिन बुधवार की रात 2ः13 बजे समाप्त हो जाएगा

 

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha)

इस कथा के अनुसार सतयुग काल में एक मुर नाम का दैत्य था, जोकि बहुत बलशाली और अत्याचारी था। इस राक्षस ने सभी देवताओं को पराजित करके देवलोक से भगा दिया था। जिसके कारण देवता बहुत दुखी थे और शरण के लिए कोई स्थान न होने पर मृत्यु लोक में भटक रहे थे। भगवान शिव द्वारा आदेश दिए जाने पर सभी देवता क्षीरसागर में भगवान श्री विष्णु से सहायता मांगने के लिए गए।

तभी भगवान श्री विष्णु ने उस राक्षस का वध करने का निर्णय लिया और सभी देवताओं को चंद्रावती नगरी में जाने का आदेश दिया। सभी देवताओं ने जब उस नगरी की ओर प्रस्थान किया तो मुर दैत्य अपनी राक्षस सेना के साथ वहां प्रकट हो गया। उसको देखकर सभी देवता भयभीत होकर इधर-उधर भागने लग गए। तभी भगवान स्वयं रणभूमि पर आए और उस दैत्य से युद्ध करना आरंभ कर दिया।

इस युद्ध में मुर की सेना के कई दैत्य मारे गए और यह युद्ध पूरे 10 हजार वर्षाें तक चलता रहा। जिसमें मुर का शरीर बुरी तरह घायल हो गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी वह लड़ता ही रहा। जिसके बाद भगवान श्री विष्णु जी मुर दैत्य को घायल छोड़कर स्वयं विश्राम करने के लिए बद्रिकाश्रम की हेमवती नामक गुफा में चले गए। जब भगवान योगनिद्रा में सो रहे थे तब मुर उनका पीछा करते करते वहां पहुंच गया। जैसे ही उसने भगवान को मारने का प्रयास किया तभी एक प्रकाश उत्पन्न हुआ। जिससे एकादशी देवी प्रकट हुई और देवी ने उस दैत्य का वध कर दिया। इस दिन को तब से उत्पन्ना एकादशी के पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

 

उत्पन्ना एकादशी का महत्व (Utpanna Ekadashi Ka Mahatva)

हरि वासर के नाम जाने वाले इस एकादशी के पर्व का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। श्री हरि भगवान के उपासक इस दिन की बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। इस दिन वैदिक कर्मकांड से पूजा करना बहुत फलदायी होता है। पितृ-तर्पण के लिए इस दिन के दोपहर का समय बहुत शुभ होता है। इस दिन किए गए पूजन से जातकों के पूर्वजों के सभी पापों का नाश हो जाता है और उनको स्वर्ग प्राप्त होता है। 

इस दिन पूजा के बाद भजन-कीर्तन करके प्रभु का गान गाया जाता है। उत्पन्ना एकादशी के अंत में क्षमा पूजा करना बहुत आवश्यक है क्योंकि मनुष्य कितने भी अनुष्ठानों का पूरा पालन करके पूजा को करे, फिर भी चंचल मन के कारण कही न कही गलती हो ही जाती है। पूजा के समय किसी अन्य वस्तु व कार्य के बारे में सोचने पर भी दोष लग जाता है। इसी कारण से अंत में क्षमा पूजा की जाती है। इस दिन सभी भक्त अपनी क्षमता के अनुसार दान देते हैं और ब्राह्मणों को भोजन के आमंत्रित करते हैं।

 

अन्य जानकारी

Latet Updates

x