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कृष्ण जन्माष्टमी 2021 | कृष्ण जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त | कृष्ण जन्माष्टमी कथा व महत्व | Krishna Janmashtami 2021

krishna janmashtami 2021
February 16, 2021

कृष्ण जन्माष्टमी 2021 | जानिए कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व के बारें, 2021 जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त, क्या है इसकी कथा और हिंदू धर्म में इसका महत्व

कृष्ण जन्माष्टमी 2021 – कृष्ण जन्माष्टमी जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है इस पर्व को हिंदुओं द्वारा कृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। श्री कृष्ण को भगवान श्री विष्णु जी का आठवां अवतार माना जाता है, जिसका उल्लेख हिंदु पुराणों में बहुत आसानी से देखने को मिल जाता है। श्री कृष्ण का अवतार मथुरा में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अर्धरात्रि में हुआ था। यह अवतार कंस के कारागार में माता देवकी की आठवीं संतान रूप में हुआ था। असुरराज कंस का विनाश करने के लिए भगवान श्री विष्णु ने यह अवतार कृष्ण के रूप में लिया था। इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्मोत्सव अर्थात जन्माष्टमी पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। 

श्री कृष्ण का जब जन्म हो रहा था तब चंद्रमा के उदय के समय रोहिणी नक्षत्र चल रहा था। हिंदु धर्म में इस दिन को बहुत ही पवित्र माना गया है। जन्माष्टमी का पर्व दो दिनों तक चलता है जिसमें मध्यरात्रि तक श्री कृष्ण के जीवन दृश्यों को कृष्ण लीला व रस लीला और नाटकों द्वारा दिखाया जाता है। भक्तों द्वारा उपवास रखें जाते हैं और भगवत पुराण कथाओं का आयोजन कराया जाता है। श्री कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा वृंदावन में रासलीला का आयोजना बड़े स्तर पर किया जाता है, जिसमें भाग लेने और देखने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।

 

वर्ष 2021 में कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त 

वर्ष 2021 में 30 अगस्त को सोमवार के दिन यह पर्व मनाया जाएगा। इस दिन निशीय पूजा की शुभ मुहूर्त अवधि मात्र 44 मिनट की होगी। दही हाण्डी का उत्सव 21 अगस्त मंगलवार के दिन होगा। जन्माष्टमी की पूजा अष्टमी तिथि के अनुसार की जाती है।

अष्टमी तिथि 29 अगस्त को रात 11 बजकर 30 मिनट से शुरू हो जाएगी और 31 अगस्त दोपहर 2 बजे तक रहेगी।

 

कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा

कथा के अनुसार द्वापर युग के अंतिम चरण उग्रसेन नाम का राजा करता था जिसके पुत्र का नाम कंस था। राज्य के लालच में कंस ने अपने पिता को सैनिकों की सहायता से करागार में बंद कर दिया। कंस जब अपनी बहन देवकी और वासुदेव को विदा रहे थे तो आकाशवाणी हुई जिसमें कहा गया था कि जिस बहन को इतने प्रेस से तू विदा कर रहा है, इसी की आठवीं संतान तेरा वध करेगी।

क्रोध में आकर कंस देवकी को मारने के लिए जा रहे थे, तभी वासुदेव ने कहा आपको आपकी बहन से किसी भी प्रकार का खतरा नहीं है बल्कि उसकी आठवीं संतान से है। मैं स्वयं आपको देवकी की आठवीं संतान सौंप दूँगा। इस बात पर कंस मान गया परंतु उसने वासुदेव और अपनी बहन को जेल में डाल दिया। उसी के कुछ समय बाद नारद जी वहां पहुंच गए और कंस से बोले कि यह कैसे पता चलेगा कि संतानों की गिनती प्रथम संतान से शुरू होगी या अंतिम। नारद मुनि द्वारा इन बातों को सुनकर कंस ने देवकी की प्रत्येक संतान को मारने का निर्णय लिया।

जन्माष्टमी

तभी भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान विष्णु के आठ वें अवतार का श्री कृष्ण के रूप में जन्म हुआ। रोहिणी नक्षत्र में जन्म के समय कारागार में  हर जगह प्रकाश फैल गया और भगवान ने देवकी और वासुदेव को अपने अमूल्य दर्शन देते हुए कहा कि हे देवकी मै एक शिशु का रूप लेकर इस द्वापर युग में आने जा रहा हूं। मुझे गोकुल में नन्द के घर पर छोड़ दो और वहां पर जिस कन्या ने जन्म लिया है उसे कंस के समक्ष रख दो। वासुदेव ने दिए गए आदेश के अनुसार वैसा ही किया और उस कन्या का कंस को दे दिया।

जब कंस ने उस कन्या को मारने का प्रयास किया, उस समय कन्या ने देवी का रूप धारण कर लिया और कंस से बोली कि मुझे मार कर तुम आकाशवाणी को नहीं बदल सकते हो। जिस आठवीं संतान ने तेरा विनाश करना हो वह गोकुल पहुंच चुकी है। इस दृश्य को देखकर कंस व्याकुल हो गया। भविष्यवाणी को गलत ठहराने और उस बालक की हत्या करने के लिए कंस ने कई प्रयास किए। उसने अपने सभी बलशाली दैत्यों को श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा, लेकिन सभी असफल रहें। श्री कृष्ण ने अपनी आलैकिक माया से सारे दौत्यों को मौत के घाट उतार दिया। अंत में कंस का विनाश करके पुन राजसिंहासन पर उग्रसेन को बैठाया।

 

कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

हिंदु धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी का बहुत महत्व है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के भक्त अर्धरात्रि तक व्रत रखते हैं। रात के बारह बजे के बाद श्री कृष्ण की आरती पूजा के बाद ही सभी अपना व्रत खोलते हैं। इस दिन दही हांडी का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व के छह दिन बाद छठी महोत्सव भी मनाया जाता है। इस दिन लोग पीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इस महोत्सव के दिन लोग भगवान के बाल रूप का पूजन करके माखन मिशरी का भोग लगाते हैं।

इस दिन मंदिरों को सजाया जाता है और लोग अन्न ग्रहण करने के बजाए फलाहार ग्रहण करते हैं। इस दिन श्री कृष्ण के बाल रूप की पूजा के बाद उनको नए वस्त्र पहनाएं जाते है और उनका श्रृंगार किया जाता है। इस दिन को भगवान के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इसलिए भगवान की प्रिय चीजों को भोग लगाया जाता है और इसके बाद गंगाजल चढ़ा कर पूजा समाप्त की जाती है और आरती की जाती है। मध्यरात्रि तक मनाए जाने वाला यह पर्व श्री कृष्ण को समर्पित है।

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