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दुर्गा पूजा 2021 में कब है | जानियें महत्व, कथा और क्यों इसे मनाया जाता है

दुर्गा पूजा
March 6, 2021

जानिए दुर्गा पूजा के पर्व के बारे में संक्षेप में, कब और क्यों इसे मनाया जाता है, वर्ष 2021 की तिथियां, दुर्गा पूजा से सम्बंधित पौराणिक कथा और हिन्दू धर्म में इसका क्या महत्व है?

दुर्गा पूजा 2021 – हिंदू धर्म में दुर्गा मां के विभिन्न रूपों का ही बहुत महत्व है, जिससे आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि मां दुर्गा पूजा के पर्व को भक्त कितनी आस्था के साथ मनाते होंगे। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष शारदीय नवरात्रि के स्वागत के रूप में मनाया जाता है। अश्विन शुक्ल षष्ठी को ही दुर्गा पूजा उत्सव का आरंभ हो जाता है और दशमी तक यह पर्व चलता है। इस पर्व में माता दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना की जाती है और उत्सव के अंत को मां की विदाई का समय मानकर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस उत्सव के चलते दुर्गा बलिदान और सिंदूर खेला की रस्म की जाती है। 

चैत्र व अश्र्विन माह के शुक्ल पक्ष में आई नवमी के दिन दुर्गा बलिदान की रस्म को किया जाता है। जिसमें सब्जियों के साथ सांकेतिक बलि दी जाती है, जिसे पूरे विधि विधान और अनुष्ठानों के पालन के साथ किया जाता है। प्राचीनकाल में इस रस्म के दौरान कई स्थानों में पशुओं की बलि दी जाती थी। इसी दुर्गा पूजा के शुभ अवसर पर सिंदूर खेला की रस्म की जाती है जिसमें महिलाएं एक दूसरे के चहरे पर सिंदूर लगाकर पति की लंबी आयु की कामना करके इस खेल को खेलती हैं। सुहागिनों के लिए यह उत्सव विशेष होता है और माता की विदाई के रूप में मनाया जाता है। मूर्ति विसर्जन से ठीक एक दिन पहले मनाए जाने वाले इस दिन का आरंभ दुर्गा जी पान के पत्ते को चढ़ा के किया जाता है। 

बंगाल में यह उत्सव बहुत बड़े स्तर पर मनाया जाता है। पान के पत्ते को अर्पित करने बाद माता को सिंदूर लगाया जाता है। इससे अगले दिन माता दुर्गा जी को विदाई दे दी जाती है। माता के आर्शीवाद से सुहागिनों को अपने पति की दीर्घ आयु का वरदान मिलता है। माना जात है माता दुर्गा इन दिनों अपने ससुराल के लिए प्रस्थान करती और विश्राम करती हैं। दशवी तिथि के समय माता वापिस लौट आती हैं। माता द्वारा माइके को छोड़ने पर विदाई को इसी रस्म माध्यम से किया जाता है।

 

जानिए कब मनाई जाती है दुर्गा पूजा?

अधिक मास के कारण हिंदू पंचांग में इसकी तिथि में अन्य वर्ष की अपेक्षा अंतर आ जाता है। इसे शरदोत्सव और दुर्गोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान समय में प्रयोग किए जाने कैलेंडर के अनुसार दुर्गा पूजा का पर्व सितंबर या अक्टूबर के महीने में आता है। यह पर्व चैत्र व अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली षष्ठी को आरंभ हो जाता है और दशमी को दशहरे के प्रसिद्ध त्यौहार से समाप्त हो जाता है। हिंदू धर्म में अष्टमी तिथि को दुर्गा महा अष्टमी कहा जाता है और दुर्गा पूजा कहा जाता है। यह त्योहार प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। पांच दिनों तक चलने वाला यह त्योहार कई राज्यों में दस दिनों तक भी मनाया जाता है।

 

दुर्गा पूजा क्यों मनाई जाती है?

मान्यताओं के अनुसार इस दिन पितृपक्ष का समापन हो जाता है और माता दुर्गा जी पृथ्वी पर आगमन करती हैं। भिन्न स्थानों व राज्यों में मान्ताएं अलग हो सकती हैं परंतु पूरे भारत में यह दिन माता दुर्गा को समर्पित हैं। इस पांच दिनों तक चलने वाले उत्सव को स्थानों में पांच से ज्यादा दिनों तक मनाया जाता है। बंगाल के लोगों के लिए माता काली की अराधना से बड़ा कुछ नहीं होता है, वहां के लोग काली माता के आर्शीवाद को प्राप्त करने के लिए यह दिन मनाते हैं। काली माता भी दुर्गा जी का ही एक अन्य रूप है। दशमी का दिन विजयदशमी व दशहरा का दिन होता है इसलिए षष्टी के दिन से ही दुर्गा मां को प्रसन्न करने के लिए यह उत्सव मनाया जाता है। इस दिन दुर्गा मां की पूजा करने से सभी कष्टों का नाश हो जाता है और सुहागिनों द्वारा रखे गए व्रत से उनके पति को दीर्घायु और निरोग जीवन की प्राप्ति होती है।

 

वर्ष 2021 में दुर्गा पूजा की तिथियां

वर्ष 2021 में 11 अक्टूबर सोमवार के दिन षष्ठी तिथि है। इसे कल्परम्भ कहा जाता है और माना जाता है कि इस दिन माता धरती पर प्रस्थान करती हैं। 15 अक्टूबर को दशहरा व दुर्गा विसर्जन के साथ पांच दिवसीय उत्सव का समापन हो जाएगा। 

13 अक्टूबर के बुधवार को दुर्गा पूजा का दिन मानकर मनाया जाएगा।

वर्ष 2021 में दुर्गा पूजा के अवसर पर मनाए जाने वाले पांच दिनों की तिथियां इस प्रकार से है :-

  1. शुक्ल षष्ठी का दिन 11 अक्टूबर को सोमवार के दिन कल्परम्भ के रूप में मनाया जाएगा। जिसमें रात 02ः16ः18 बजे से 23ः52ः30 तक षष्ठी तिथि रहेगी 
  2. शुक्ल सप्तमी 12 अक्टूबर को मंगलवार के दिन नवपत्रिका पूजा द्वारा मनाई जाएगी। 11 अक्टूबर की रात 23ः52ः30 षष्ठी के समापन के साथ ही सप्तमी तिथि आरंभ होकर मंगलवार रात 21ः49ः38 पर समाप्त हो जाएगी। इस पूजा में नौ पत्तों का प्रयोग पूजा में किया जाता है। 
  3. शुक्ल अष्टमी 13 अक्टूबर को बुधवार के दिन आएगी। इस दिन दुर्गा महा अष्टमी पूजा की जाती है और दुर्गा पूजा का पर्व मनाया जाता है। अष्टमी की तिथि मंगलवार की रात 21ः49ः38 बजे से बुधवार रात 20ः09ः56 बजे तक होगी। इस दिन नौ कलश रखे जाते हैं और कुमारी पूजा भी की जाती है। 
  4. माह के शुक्ल नवमी के दिन 14 अक्टूबर को गुरुवार के दिन दुर्गा महा नवमी की पूजा की जाती है और इसे पूजा का अंतिम दिन माना जाता है। नवमी की तिथि बुधवार 20ः09ः56 बजे से गुरुवार 18ः54ः40 बजे तक होगी 
  5. शुक्ल दशमी का दिन बहुत विशेष होता है इस दिन दशहरा होता और दुर्गा विसर्जन भी इसी दिन किया जाता है इसलिए इस दिन का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दशहरा और दुर्गा विसर्जन 15 अक्टूबर को शुक्रवार दिन मनाया जाएगा। इसमें दशहरा के दिन विजय और अपराह्न मुहूर्त विशेष होता है और माता दुर्गा के विसर्जन का समय अलग होता है। 
  • दशहरा त्योहार के समय विजय मुहूर्त शुक्रवार को दोपहर 14ः01ः53 से 14ः47ः55 तक 46 मिनट की अवधि का रहेगा। वहीं अपराह्न मुहूर्त 13ः15ः51 से 15ः33ः57 बजे तक रहेगा। 
  • दुर्गा विसर्जन के मुहूर्त की अवधि 2 घंटा 18 मिनट की होगी। जिसमें दुर्गा विसर्जन का शुभ समय सुबह 06ः21ः33 से आरंभ होकर 08ः39ः39 बजे समाप्त हो जाएगा। 

दुर्गा पूजा से संबंधित पौराणिक कथा

हिंदू पुराण में लिखित कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक बहुत शक्तिशाली महिषासुर नाम का राक्षस था। इस राक्षस ने स्वर्ग लोक को अपने अधीन करने के लिए भगवान ब्रह्मा जी की कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इस तपस्या से ब्रह्मा जी बहुत प्रसन्न हुए थे और महिषासुर को अपने दर्शन दिए थे। ब्रह्मदेव ने उस राक्षसराज के सामने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। उस समय महिषासुर ने अमरता का वर मांग लिया था, लेकिन ब्रह्मा जी ने यह वरदान देने से उस राक्षसराज को मना कर दिया था। इस वरदान के बदले में महिषासुर ने कहा कि मेरा वध केवल स्त्री के हाथों होना ही संभव हो, स्त्री के बजाए कोई भी व्यक्ति उसका वध करने में सक्षम न हो। इस वरदान के लिए ब्रह्मा जी मान गए थे और तथास्तु कह कर वहां से अदृश्य हो गए।

महिषासुर ने सोचा की मुझ जैसे बलशाली राक्षस को कोई स्त्री भला कैसे ही वध कर पाएगी अर्थात खुद को अमर सोच कर महिषासुर बहुत प्रसन्न हुआ। वरदान प्राप्ति के कुछ समय बाद ही राक्षस राज ने स्वर्ग लोक पर अपना सेना की सहायता से आक्रमण कर दिया। उसके इस आक्रमण से सारे स्वर्ग लोक में हाहाकार मच गया और सभी देवता ब्रह्मा के वरदान के कारण उसका कुछ नहीं कर पाए। ऐसे में युद्ध हार कर सभी देवताओं को स्वर्ग लोक से जाना पड़ा।

उसके बाद सभी देव सहायता के लिए त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव के पास सहायता मांगने के लिए गए। ब्रह्मा के वरदान का पालन करने के कारण त्रिदेवों में भी कोई इस राक्षस का वध करने में सक्षम नहीं था। तभी ब्रह्मा जी, भगवान श्री विष्णु और महादेव जी ने आंतरिक शक्ति का प्रयोग किया। तीनों द्वारा निर्माण की शक्ति से स्त्री रूप में मां दुर्गा प्रकट हुई। उसके बाद माता दुर्गा जी और महिषासुर में एक भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में ब्रह्मा जी के वरदान के फलस्वरूप दुर्गा जी ने राक्षस महिषासुर का वध कर देवताओं को उनका स्वर्ग लोक दिलाया। महिषासुर का संहार दुर्गा माता ने अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को ही किया जाता है। इस प्रकार अच्छाई की बुराई पर जीत के रूप में इसे विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है।

इसके अलावा रामायण के अनुसार भगवान श्री राम ने इस दिन लंकापति रावण का वध किया था। विजयदशमी से संबंधित कई मान्यताएं हो सकती हैं। लेकिन दशहरे के इस दिन को धर्म की अधर्म पर विजय मानकर मनाया जाता है।

दुर्गा पूजा का हिंदू धर्म में महत्व

इस दिन मां दुर्गा के मंत्र उच्चारण से पूरा भारतवर्ष गूंज पड़ता है और पवित्र हो जाता है। शक्ति की देवी माने जानी वाली मां दुर्गा की पूजा भक्तों द्वारा की जाती है। इस दिन बहुत बड़े स्तर पर पाठ व हवनों का आयोजन किया जाता है। षष्ठी से दशमी तक आने वाले सभी दिन माता दुर्गा जी को समर्पित होते हैं, जिसमें उनकी अराधना की जाती है। भारत के कई राज्यों में इसे दस दिनों तक मनाया जाता है। बंगाल के लोगों के लिए दुर्गा पूजा के त्यौहार का बहुत महत्व होता है। 

इस पांच दिवसीय त्योहार से शारदीय नवरात्रों के आने का ज्ञान भक्तों को हो जाता है। इससे कुछ दिनों के बाद ही शारदीय नवरात्रि के दिन आरंभ हो जाते हैं। दुर्गा पूजा की दशमी को हिंदू धर्म का प्रसिद्ध त्योहार दशहरा आता है। जिसे बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है और रावण के साथ उसके पुत्र मेघनाथ और रावण के भाई कुंभकर्ण के बड़े बड़े पुतलों को जलाया जाता है। इस दिन की शुरूआत भी दुर्गा पूजा से की जाती है। वहीं शारदीय नवरात्रों के नौ दिवसीय अवसर पर माता दुर्गा के नौ अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। इन दिनों में मिठाई को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर व्रत को खोला जाता है।

हिंदू धर्म में अष्ठमी के दिन को दुर्गा पूजा का पर्व मानकर मनाया जाता है, लेकिन बंगाल में दशहरा यानि विजयदशमी का दिन दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में बड़े पंडालों में दुर्गा माता की विशालकाय मूर्तियों को स्थापित किया जाता है। इन मूर्तियों को देश के चुनिंदा कलाकार ही तैयार करते हैं। वहीं इस दिन बड़े-बड़े भंडारों का आयोजन कर कई लोगों को भोजन करवाया जाता है। अष्ठमी के दिन महापूजा के शुभ अवसर पर बली भी दी जाती है जिसमें आज के समय में सब्जियों का प्रयोग किया जाता है। पुरूष एक दूसरे के साथ पुरानी गलतियों को भुला कर आलिंगन करते हैं जिसे कोलाकुली कहा जाता है। स्त्रियां दुर्गा माता की प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ाती हैं। उसके बाद परंपराओं का पालन कर एक दूसरे के गालों पर सिंदूर लगाती हैं। शोभायात्रा में माता की बड़ी बड़ी प्रतिमाओं को वाहन पर रख कर पूरे क्षेत्र में घूमा जाता है और इनका विसर्जन किया जाता है। इस दिन का सनातन धर्म में विशेष महत्व है।

 

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