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भाई दूज 2022 | भाई दूज क्यों मनाई जाती है | वर्ष 2022 भाई दूज पूजा का शुभ मुहुर्त | भाई दूज का महत्व | Bhai Dooj 2022

भाई दूज 2022
June 16, 2021

भाई दूज 2022 | जानिए भाई दूज क्यों मनाई जाती है, 2022 में पूजा का शुभ मुहुर्त, जानें भाई दूज से संबंधित विशेष जानकारी और इसके महत्व के बारे में

दिवाली के दो दिनों के बाद आने वाला भाई दूज पर्व भाई और बहन के प्यार को प्रदर्शित करता है। प्रत्येक वर्ष मनाए जाने वाले इस त्योहार के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। भाई बहन के स्नेह रिश्ते को यह पर्व और मजबूत बनाकर कर जाता है। माना जाता है कि यमराज देव के उपासक का अकाल मृत्यु का भय खत्म हो जाता है और माता यमुना जी की उपासना करने वालों भक्तों के सारे कष्टों का निवारण हो जाता है।

भाई दूज के दिन बहनें आपने भाइयों के लिए यम देवता से कल्याण, स्वास्थ्य, सुरक्षित जीवन और दीर्घ आयु की कामना हेतु व्रत रखती हैं और उनके मस्तक के बीच में रोली चंदन का तिलक लगाकर मिठाई खिलाती हैं। भाई अपनी बहनों को रक्षा के वचन के साथ उपहार भी देते हैं। भाई दूज के दिन भाई की अनुपस्थिति में कन्याएं चंद्रमा से प्रार्थना करके यह त्योहार मनाती हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों पर इस पर्व को मनाने की परंपराएं और अनुष्ठान अलग हो सकते हैं परंतु यह पर्व भाई बहन के प्रेम को समर्पित है।

भाई टीका

भाई टीका के नाम से भी जाने वाला यह त्योहार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन सुबह स्नान करने के बाद सर्वप्रथम श्री गणेश और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। भाई को इस दिन बहन के घर में ही स्नान करना चाहिए। एक मान्यता के अनुसार इस दिन भाई को बहन के घर जाकर, बहन द्वारा बनाया गया भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। पैराणिक कथाओं के अनुसार युमना जी ने इस त्योहार की शुरूआत की थी इसलिए अगर संभव हो तो यमुना में स्नान करके इस दिन को शुभारंभ करना चाहिए।

 

भाई दूज की पूजा विधि 

इस दिन बहनों द्वारा भाई को चौंकी पर बैठाने के बाद उनके ऊपर चावल चढ़ा कर पूजा करती हैं। भाई दूज की इस पूजा में सबसे पहले भाई के माथे पर चावल का तिलक लगाया जाता है और हाथों पर चावलों का घोल लगाया जाता है। उसके उपरांत भाई की हथेली में चावल, पुष्प, पान और सुपारी इत्यादि पूजा में प्रयोग होने वाला सामान रखकर जल गिराया जाता है। उसके बाद आरती उतारी जाती है फिर रक्ष सूत्र बांधा जाता है जिससे सकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है। पूजा के बाद बहन द्वारा भाई को मिठाई खिलाई जाती है और अगर भाई बड़ा हो तो पैर छूकर आर्शीवाद लेती है। वहीं अनुज भाई अपनी दीदी के पांव स्पर्श करके आर्शीवाद लेता है।

कुछ परंपराओं के अनुसार पूजा के बाद भाई को सूखा नारियल देना चाहिए और बहनों को यमराज देव लिए शाम के समय चैमुखी दीपक जला कर उसे घर के बाहर रखना चाहिए।

 

रक्ष सूत्र बांधते समय रखी जाने वाली सावधानियां

रक्ष सूत्र बांधने के नियमों का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है, गलत तरीके से बांधा गया कलावा या रक्ष सूत्र अशुभ माना जाता है। रक्ष सूत्र के बहुत पुराने हो जाने पर इसे किसी भी नहीं बदला जा सकता है। पुराना हो जाने पर इसे केवल मंगलवार और शनिवार के दिन ही बदलना चाहिए। कलावा बांधते समय भाई का अपनी मुट्ठी बंद रखनी चाहिए और बहन को यह ध्यान रखना चाहिए कि रक्ष सूत्र को मात्र तीन बार लपेटना चाहिए।

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि को यमुना ने यमराज को तिलक लगाया था और अपने हाथों द्वारा बना भोजन खिलाया था। जिसके बाद यमुना ने वर मांगा था कि इस दिन जो बहन मेरी भांति अपने भाई को आदर सहित टीका करके भोजन कराये उसमें तुम्हारा भय समाप्त हो जाए। उस दिन से लेकर आज तक शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को भाई दूज के नाम से मनाया जाता है। इसके अलावा इसे यमादविथिया और यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है।

एक मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जो भी भाई बहन इस पर्व को विधि विधान से पूजा करके मनाते हैं। चाहे जितनी भी बड़ी दुर्घटना हो जाए, यमराज देवता उनके इस दिन प्राण नहीं हरते।

भाई दूज की पौराणिक कथा

शास्त्रों में लिखी कथा के अनुसार भगवान सूर्य की छाया नाम की पत्नी थी। जिनकी दो संताने थी जिसमें पुत्र का नाम यमराज और यमुना नाम की पुत्री थी। दोनों भाई बहन में काफी स्नेह था। कुछ समय के बाद सूर्य देव का तेज न सहन कर पाने पर छाया उत्तरी ध्रुव चली गई और अपनी दोनों संतानों को भी साथ में ले गई। माना जाता है इसी वजह  से शनिदेव और ताप्ती नदी का जन्म हुआ था। उत्तरी ध्रुव में रहते हुए समय निकलता गया। बदलते समय के साथ-साथ छाया का अपने बच्चों के प्रति व्यवहार भी बदल गया।

माता के इस व्यवहार से यमराज तंग आ गए और अपनी नगरी यमपुरी बनाने की सोच ली और अपने साथ अपनी प्रिय बहन को भी ले गए। यमुना अपने भाई द्वारा पापियों को दंड देते हुए नहीं देख पाती थी और ऐसे में वह गोलोक रहने लगी। दोनों दूर तो रहते थे लेकिन उनका आपस में स्नेह कम नही हुआ था। दोनो एक दूसरे को याद करते थे। लेकिन यम काम में इतने व्यस्त रहते थे कि अपनी बहन से मिल नहीं पाते थे।

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन यमुना ने अपने भाई यम देव को भोजन पर बुलाया था और गोलोक आने का वचन दे लिया था। इस निमंत्रण के बाद यमराज यह सोच रहा था कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं, मेरे को कोई क्यों बुलाएगा। लेकिन बहन की आज्ञा का पालन करना यमराज ने अपना कर्तव्य माना और वचन की लाज रखते हुए वह अपनी बहन के पास गए। बहन के पास जाते समय यमराज ने सभी पापी प्राणियों को मुक्त कर दिया था। 

यमराज को घर आते देख यमुना बहुत खुश हुई। यमुना आरती करके अपने भाई का स्वागत किया। यमराज ने बहन के घर पर स्नान किया। उसके बाद यमुना ने अपने हाथों से बनाया हुआ खाना अपने भाई को खिलाया। यमुना द्वारा किए गए आदर सत्कार से खुश हो कर यमराज ने अपनी बहन को वर मांगने केे लिए कहा। यमुना ने कहा कि आप वर्ष में इस दिन घर जरूर आएँगे। इस दिन मेरी तरह जो बहन अपने भाई को टीका लगाकर आदर सत्कार के साथ भोजन खिलाएगी उसका तुम्हारे प्रति अर्थात मृत्यु भय खत्म हो जाए। उसके बाद यमराज देव ने तथास्तु कहकर अपनी बहन को वस्त्र और आभूषण उपहार के रूप में दिए। उस दिन से यह दिन भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा और इसलिए इसदिन यमराज देव और माता यमुना की पूजा की जाती है।

इसी प्रकार भगवान कृष्ण की कथा भी भाई दूज के दिन श्रवण में आती है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण मिलने के लिए अपनी बहन सुभद्रा के पास नरकासुर का वध करने के पश्चात गए थे। उस समय सुभद्रा जी ने अपनेे भाई श्री कृष्ण का तिलक लगा कर और विधि विधान से पूजा करके स्वागत किया था। उस दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष का दूसरा दिन था। तब से लेकर आज तक भाई दूज का यह त्योहार मनाया जाता है।


भाई दूज का महत्व

यह दिन हिंदु धर्म में बहुत महत्व रखता है। यम देव की पौराणिक कथा के चलते इसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है जो इस दिन यमुना में स्नान करके भाई दूज के पर्व को विधि विधान से मनाता है उसे यमलोक में नहीं जाता पड़ता। वहीं यमुना जी की पूजा से सारे कष्टों का निवारण हो जाता है। इसी से भाई दूज के पर्व पर यमुना और यमदेव की पूजा का महत्व बढ़ जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र की कामना करके इस त्योहार को मनाती हैं।

 

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